Tuesday, October 4, 2022
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‘Brahmāstra Part One: Shiva’ Review: रणबीर-आलिया की ‘ब्रह्मास्त्र’ देखकर बोलेंगे कि इंडियन सिनेमा का शाहकार

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कुछ फिल्म तजुर्बा होती हैं, जिन्हे देखकर आपको चौंकते हैं कि ये भी किया जा सकता है ? ब्रह्मास्त्र, उन्ही फिल्मों में से है। साउथ से नार्थ तक ब्रह्मास्त्र का प्रमोशन और बायकॉट का गेम दोनो एक साथ चल रहा है। लेकिन इस फिल्म को देखने की बेताबी ऐसी थी, कि तकरीबन 200 सीटर थियेटर में, जो आम तौर पर प्रेस स्क्रीनिंग के दौरान आधा खाली होता है, उस थियेटर में देर से आने वालों क्रिटिक्स के लिए सीटें नहीं थीं।

शायद इसकी वजह, फिल्म की राइट मैसेजिंग है जिसके लिए डायरेक्टर अयान मुखर्जी ने वीडियोज़ बनाए, प्रेस कॉन्फ्रेंस किए और साउथ के सुपरस्टार डायरेक्टर राजामौली के साथ मिलकर ब्रह्मास्त्र के बारे में लोगों तक जानकारी पहुंचाई।

बायकॉट के शोर के बीच, आईमैक्स थ्री डी के लिए जब ब्रह्मास्त्र की शुरुआत हुई, तो पहले फ्रेम से ही समझ आ गया कि ये फिल्म नहीं, एक सपना है। इस सपने को अयान मुखर्जी ने शूटिंग शुरु होने के 6 साल पहले से देखना शुरु किया। ये अस्त्रावर्स की दुनिया की शुरुआत है, ब्रह्मास्त्र पार्ट वन – शिवा। हॉलीवुड हमारे कल्चर से इंस्पायर होकर अवतार बनाता है, एवेंजर्स की सीरीज़ में भारतीय परंपरा, योग शक्ति, आत्मिक ज्ञान और अस्त्रों को बेस बनाया गया। लेकिन बॉलीवुड फिल्म मेकर्स इतना बड़ा सपना कभी देख ही नहीं पाए। शायद उसके लिए हम भी ज़िम्मेदार हैं कि हम भरोसा दिखाने को तैयार ही नहीं होते कि हमारी कहानियों को परदे पर दिखाने के लिए जो तकनीक, जो बजट और जो वक्त लगे, उसकी हम यानि कि ऑडियंस कद्र करे।

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ब्रह्मास्त्र की शुरुआत होती है बिग बी की आवाज़ के साथ, जो ब्रह्मांड की शक्तियों, हिंदू माइथोलॉजी के अस्त्रों के साथ, ब्रह्मास्त्र के उदय के बारे में बताती है और शिवा तक लेकर आती है। उधर शिवा से आपकी पहचान होती है, और तुरंत एंट्री होती है साइंटिस्ट मोहन की, जो ब्रह्मास्त्र के एक हिस्से का रक्षक है और वानरास्त्र का वाहक है। साइंटिस्ट मोहन बने शाहरुख़ के साथ ब्रह्मास्त्र की शुरुआत ही आपको बोनस प्वाइंट्स दे देती है।

और उतनी ही जल्दी आपको झटका भी लगता है जब ब्रह्मास्त्र के तीनों हिस्से पाने को बेताब जुनून से, साइंटिस्ट माधव खुद मौत को गले लगा लेते हैं। शिवा की मुलाकात ईशा से होती है और अनाथ शिवा की ज़िंदगी में रौशनी होती है। शिवा को अचानक अपने सपनो में सब कुछ दिखने लगता है, जुनून का ब्रह्मास्त्र के लिए जुनून, साइंटिस्ट माधव की मौत और जूनून का अगला शिकार साइंटिस्ट अनीश, जो वाराणसी में है और जो ब्रह्मास्त्र के दूसरे हिस्से का रक्षक है।

ईशा के साथ मिलकर शिवा वाराणसी जाता है और उसे अपने अंदर कुछ और बदलता हुआ महसूस होता है। अनीश को जुनून से शिवा और ईशा बचाते हैं और वहां उन्हे पता चलता है कि अनीश सिर्फ़ ब्रह्मास्त्र के दूसरे हिस्से का रक्षक नहीं, बल्कि नंदी अस्त्र भी है।

जुनून से ब्रह्मास्त्र को बचाना है। ब्रह्मांश तक पहुचना है। शिवा को अपने अतीत, अपने मां-बाप के बारे में जानना है और साथ ही ये भी जानना है कि आग से उसका रिश्ता क्या है, उसे क्यों ब्रह्मास्त्र से जुड़े सपने आ रहे हैं, जुनून किसके लिए ब्रह्मास्त्र पाना चाहती है, वो शक्ति कौन है, जो ब्रह्मास्त्र को हासिल करके सर्वशक्तिमान बनना चाहती है ? इन सारे सवालों के जवाब देने के साथ-साथ, ब्रह्मास्त्र पार्ट वन – शिवा से आप ब्रह्मास्त्र पार्ट टू – देव तक पहुंच जाते हैं।

और आगे लंबा इंतज़ार…

 

पहले ब्रह्मास्त्र की खूबियों के बारे में बात करते हैं। ये एक शानदार कोशिश है, ऐसी कोशिश, जो भारत में मार्वल जैसा या उससे भी बेहतर सिनेमैटिक यूनीवर्स बनाने का दम रखती है। अस्तावर्स के साथ, ये भारतीय पौराणिक कहानियों और संस्क़ति लेकर बनने वाली पहली फिल्म है। स्पेशल इफेक्ट्स ऐसे हैं, जो इंडियन सिनेमा में आज तक नहीं देखे गए। कोशिश शानदार है, कहानी में रफ्तार है, ब्रह्मास्त्र, वानरास्त्र, नंदी अस्त्र के साथ-साथ दशहरा, दीवाली जैसे हिंदू त्यौहारों का ऐसा सेलिब्रेशन भी हिंदी सिनेमा ने कभी नहीं देखा। वाराणसी के घाट, संस्कृति के साथ ये कहानी रौंगटे खड़े करती है।

अब ख़ामियों पर आते हैं, तो शिवा और ईशा का रोमांटिक ट्रैक शुरु में खटकता है, हांलाकि आगे बढ़ने के साथ-साथ इसे अच्छे से समझाया गया है। डायलॉग्स के तौर पर ब्रह्मास्त्र कमज़ोर है। इसके डायलॉग में और मेहनत की जानी चाहिए थी। गाने के तौर पर केसरिया सबसे बेहतर है, देवा-देवा में भी दम है, लेकिन डांस का भूत बिल्कुल सूट नहीं करता। ईशा, देवा का ट्रिगर प्वाइंट क्यों है, उसकी बैक स्टोरी बिल्कुल मिसिंग है। इतने बड़े सपने को सच करने में, छोटी गलतियां होती हैं, लेकिन ये गलतियां बड़ा नुकसान करती हैं। अयान को अस्त्रावर्स की अगली फिल्में बनाने में इसका ख़्याल रखना होगा।

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परफॉरमेंस पर आइए तो रणबीर फिल्म का सबसे पॉवरफुल अस्त्र हैं। शिवा के किरदार में रणबीर ने अपनी पूरी जान झोंक दी है। ईशा के तौर पर, आलिया उतनी ही बेहतरीन हैं। शाहरुख़ ख़ान को साइंटिस्ट मोहन के तौर पर अच्छे खासे वक्त के लिए एक्शन करते देखना, एक ट्रीट है। किंग ख़ान वाकई जादूगर हैं। ब्रह्मांश के गुरू के तौर पर अमिताभ बच्चन, ब्रह्मास्त्र के सबसे बड़े अस्त्रों में से एक हैं। नंदी अस्त बने नागार्जुन ने अपने छोटे से रोल में भी जान डाल दी। मौनी रॉय के करियर में ये सबसे बड़ा ब्रेक है, बहुतों को उम्मीद ही नहीं होगी कि ब्रह्मास्त्र के पहले पार्ट में मौनी ही मेन विलेन होंगी। ये झटका आपको भी लग सकता है, लेकिन मौनी ने कोशिश बहुत शानदार की है।

ब्रह्मास्त्र देखिए, क्योंकि ये तजुर्बा है, एक शुरुआत है और ऐसी फिल्म बनाना हिम्मत की बात है। वरना फिर ना कहिएगा कि भारत में तो ऐसा हो ही नहीं सकता।

ब्रह्मास्त्र को 3.5 स्टार।

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