Thursday, December 1, 2022
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GoodBye Film Review : ‘गुडबाय’ देख कभी निकलेंगे आंसू तो कभी आएगी हंसी, जानें कैसी है फिल्म की स्टोरी

रश्मिका मंदाना और अमिताभ बच्चन स्टारर फिल्म 'गुडबाय' पर्दे पर कैसी दिखती है, ये जानने के लिए एक बार जरूर पढ़ें E24 का रिव्यू।

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GoodBye Film Review, Navin Singh: हिंदू समाज में पर्व हो या त्योहार या फिर अंतिम संस्कार इनके लिए कुछ ना कुछ नियम या रीति रिवाज बनाये गये हैं और ये मानने वाले पर होता है कि उन रीति रिवाज़ों को मान कर समझे या समझ कर माने। कई बार आस्था और धर्म के पीछे साइंस का लॉजिक लगाने की भी कोशिश की जाती है। साइंस और रीति रिवाज के आपसी मतभेद की कहानी है गुडबाय। गुडबाय सिर्फ़ एक फ़ैमिली ड्रामा नहीं बल्कि यहां हमारे रीति रिवाज के प्रति सोच और धारणाओं की भी बात बताती है। विकास बहल की यें फ़िल्म गुडबाय दर्शकों के लिए कैसी है, जानने के लिए पढ़ें E24 का रिव्यू।

वैसे ये कई धर्मों में देखा जाता है लोग मरने के बाद भी अपनी प्लानिंग करके जाते हैं कि उनके जाने की बाद उनका अंतिम संस्कार कैसे होगा पर बात जब हिन्दू धर्म की हो तो ऐसी कोई प्लानिंग ना कहीं देखी ना कहीं सुनी गई है। गुडबाय देखने के बाद आपके ज़हन में यें ख़्याल ज़रूर आएगा।

कहानी

कहानी चंडीगढ़ के हरीश भल्ला (अमिताभ बच्चन ) और उनकी पत्नी गायत्री ( नीना गुप्ता ) की है जो अपने चार बच्चों के साथ रहते हैं। चारों बच्चे अपनी पढ़ाई और काम के सिलसिले में देश विदेश शिफ्ट हो चुके है। तारा ( राश्मिका मन्दाना ) मुंबई में वकील हैं, दो बेटे जिनमें से अंगद (पवेल गुलाटी ) विदेश में मल्टीनेशनल कंपनी में काम करता है और करन (साहिल मेहता ) दुबई में काम करता है वही छोटा बेटा नकुल (अभीशेख़ ख़ान) माउंटेनियर है। ज़िंदगी से भरपूर गायत्री की अचानक से हार्ट अटैक से मौत हो जाती है। सभी बच्चे अपनी मां के अंतिम विदाई में लिए चंडीगढ़ पहुंचते हैं और यहां से शुरू होती है उनकी कहानी…

सुपर 30 और क्वीन जैसी फ़िल्में देने के बाद डायरेक्टर विकास अब दर्शकों के लिए फ़ैमिली ड्रामा के रूप में गुडबाय लेकर आये हैं। इस फ़िल्म के ज़रिए विकास ने बड़े सरल तरीक़े से कई मुद्दों को सामने लाने की कोशिश की है। रीति-रिवाज और साइंस का मतभेद, एक साधारण मीडिल क्लास फैमिली में रोजाना होने वाली उलझनें, आज के दौर में परिवार के बीच बढ़ती दूरियां और किसी अपने के जाने का गम, आपको इस फिल्म में तमाम तरह के इमोशंस मिलेंगे। किसी के जाने के बाद मुंडन कराने के पीछे का साइंटिफिक लॉजिक हो या मरने के बाद पार्थिव शरीर की नाक में रूई डालना या फिर पार्थिव शरीर के पैरों के अंगूठे को बांधना क्या ये महज़ अंधविश्वास है या साइंस इस तरह की सवालों की जवाब को विकास नए बखूबी से दिया है।

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फ़िल्म के ज़रिए आप एक इमोशनल राइड पर जाएंगे। जहां आप कभी हंसते हैं तो कभी आपके आपके आंसू रुकने का नाम ही नहीं लेते। अगर क्रिटिक के नज़रिए से देखा जाये तो फ़िल्म में कुछ कमियां नज़र ज़रूर आएगी पर कहानी आपको इतनी अपनी सी लगेगी की आप ये ख़ामियों को नज़रअंदाज़ कर देंगे। लंबे समय के बाद फ़ैमिली ड्रामा बड़े पर्दे पर दर्शकों के बीच आयी है जिसका फ़ायदा मेकर्स को मिल सकता है। फ़िल्म के शुरू होने के 15 मिनट बाद ही आप रोने लगते है इसकी ख़ासियत ये है कि इंटेंस सब्जेक्ट होने के बाद भी मेकर्स ने इसे बखूबी से बैलेंस किया है। फ़िल्म मी सभी सिचुएशन इतनी बखूबी से फिट किए गए हैं कि आप कब रोते रोते हंसने लगते हैं वो समझ ही नहीं आता। फ़िल्म के सीक्वेंस बहुत लंबे हैं जिसके वजह से इसका पेस खींचता हुआ सा लगता है। फ़िल्म की एडिटिंग पर भी थोड़ी कमी दिखी पर फ़िल्म का प्लस प्वाइंट ये है की यहां आप किरदारों से ख़ुद को कनेक्ट कर पाते हैं। हमारी ज़िंदगी में कई ऐसे मौक़े रहे हैं जहां हम अपने पैरेंट्स को फॉर ग्रांटेड ले लेते हैं और जब वो हमारे बीच नहीं होते तो रह जाता है सिर्फ़ एक शब्द “काश” फ़िल्म में एक चीज जो खलती है, वो है तारा (रश्मिका ) का एक्सेंट, रश्मिका ने खुद ही डायलॉग डब किया है, जो कन्विंसिंग नहीं लगते हैं। दावा है कि फिल्म देखने के बाद आप अपनी मां या करीबी को एक बार कॉल जरूर करेंगे।

फ़िल्म का प्लस पॉइंट है इसका म्यूजिक जिसका पूरा क्रेडिट जाता है अमित त्रिवेदी को, अमित नए हर गानों को सिचुएशन के हिसाब से कंपोज़ किया है। रवींद्र सिंह भदौड़िया और सुधाकर रेड्डी की सिनेमेटोग्राफ़ी ठीक रही है। चाहे वो ऋषिकेश हो या चंडीगढ़ आप बखूबी से कन्विंस हो जाते हैं। ऋषिकेश में गंगा किनारे वाले सीन में अमिताभ बच्चन के क्लोज़अप शॉट और मोनोलॉग सीन को बखूबी शूट किया गया है।

फिल्म की कास्टिंग

अब बात करते हैं फ़िल्म के कास्टिंग की, फ़िल्म की कास्टिंग सटीक रही है। अमिताभ बच्चन का पिता के रूप में ग़ुस्सा हो या बेबसी, पर्दे पर हर इमोशन खूबसूरत लगता है। वहीं नीना गुप्ता की एंट्री स्क्रीन पर जब जब होती है वो एक फ़्रेशनेस लेकर आती हैं। पूरे परिवार को एक डोर से बंधी गायत्री के किरदार में नीना ने इसे जी लिया है। इसने दिग्गज कलाकारों के बीच रश्मिका का कॉन्फिडेंस कमाल का रहा है। उनकी सहजता पूरे सीन्स के दौरान दिखती है। हिंदी फ़िल्म में रश्मिका का डेब्यू आपको निराश नहीं करेगा। इस फिल्म में सुनील ग्रोवर की एंट्री सेकेंड हाफ में होती है, थोड़े से सीन में बड़ा कमाल कर दिखाया है सुनील ने, जितने वक्त भी वे कैमरे के सामने रहें, आप उनको देख कर इंजॉय करेंगे। पवेल गुलाटी एक सीन के दौरान रुला जाते हैं, आशीष विद्यार्थी ने एक पड़ोसी और पुराने मित्र के रूप में कमाल का किरदार निभाया है वहीं बाकी साहिल मेहता, एली अवराम, शिविन नारंग, अभीशेख़ ख़ान, अरुण बाली, शयांक शुक्ला, ने अपना किरदार बखूबी से निभाया है।

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एक लंबे समय बाद फैमिली ड्रामा की वापसी हुई है और अब दर्शकों के सामने है। बेहतरीन एक्टिंग और खूबसूरत मेसेज के लिए यह फिल्म देखा जा सकता है। आपको आपके अपनों से कनेक्ट कराएगी ये फ़िल्म।

फ़िल्म को मिलते हैं साढ़े तीन स्टार

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