Saturday, 18 April, 2026

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Bhooth Bangla Review: नॉस्टेल्जिया की आंधी में खोई कहानी, अक्षय-प्रियदर्शन की जोड़ी नहीं दिखा पाई पुराना जादू

Bhooth Bangla Review: अक्षय कुमार और प्रियदर्शन की 'भूत बंगला' बड़ी उम्मीदों के साथ आई थी, लेकिन पुरानी फिल्मों की खिचड़ी और कमजोर कहानी के चलते यह दर्शकों को निराश करती है. आइए जानते हैं कि फिल्म की कहानी क्या है और कहां पर फिल्म कमजोर पड़ जाती है...

Bhooth Bangla Review: अक्षय कुमार की फिल्म ‘भूत बंगला’ आज यानी 17 अप्रैल को सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है. जहां फिल्म को देखते हुए आपको बार-बार ऐसा लगेगा जैसे आप कुछ जाना-पहचाना देख रहे हैं, लेकिन उसमें वह बात या ‘स्पार्क’ गायब है, जो कभी हुआ करती थी. अक्षय कुमार और प्रियदर्शन की सुपरहिट जोड़ी से जो उम्मीदें थीं, वे फिल्म शुरू होते ही फीकी पड़ने लगती हैं और क्लाइमेक्स तक आते-आते पूरी तरह खत्म हो जाती हैं. ट्रेलर देखकर लगा था कि ‘भूल भुलैया’ वाला जादू फिर से चलेगा, लेकिन अफसोस, ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ.

क्या है फिल्म की कहानी?

कहानी मंगलपुर गांव की है, जहां ‘वधुसुर’ नाम का भूत नई-नवेली दुल्हनों को गायब कर रहा है. इसका कनेक्शन लंदन में रह रहे जिशु सेनगुप्ता गुप्ता के परिवार से जुड़ता है, जिनके बेटे अक्षय कुमार और मिथिला पारकर हैं. अक्षय और जीशू की कास्टिंग बिल्कुल भी मेल नहीं खाती, जो शुरुआत में ही अटपटा लगता है. लगता ही नहीं है कि अक्षय जिशु सेनगुप्ता के बेटे हैं. इसके अलावा, यह बात भी समझ से परे है कि मिथिला पारकर एक ऐसे कट्टर अंधविश्वासी घर में शादी के लिए क्यों तैयार होती हैं, जहां उनका मंगेतर उनके लिए कोई स्टैंड नहीं लेता. फिल्म का पूरा शोर इसी इर्द-गिर्द घूमता है कि आखिर यह ‘वधुसुर’ कौन है और उसका मकसद क्या है.

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सच कहें तो, फिल्म की स्क्रिप्ट 1979 की ‘जानी दुश्मन’, ‘भूल भुलैया’, हॉलीवुड फिल्म ‘लाइट्स आउट’ और क्लाइमेक्स में ‘शैतान’ जैसी फिल्मों की एक कमजोर खिचड़ी बनकर रह गई है.

कास्टिंग दमदार, लेकिन कहानी बेदम

फिल्म में अक्षय कुमार, परेश रावल, राजपाल यादव, जिशु सेनगुप्ता गुप्ता और राजेश शर्मा जैसे मंझे हुए कलाकार हैं. तब्बू जब भी स्क्रीन पर आती हैं, तो फिल्म में थोड़ी जान आती है, लेकिन अफसोस कि पटकथा इतनी कमजोर है कि बेहतरीन कलाकार भी इसे डूबने से नहीं बचा पाते.

मेकिंग और डायरेक्शन: कहां हुई चूक?

फिल्म का पैटर्न ‘धुरंधर’ की सफलता को भुनाने की कोशिश में तैयार किया गया है—पेड प्रिव्यू और 2 घंटे 44 मिनट की लंबाई है. फिल्म को U/A सर्टिफिकेट मिला है, लेकिन कुछ दृश्य इतने अजीब हैं कि परिवार के साथ देखने में आपको असहज महसूस हो सकता है. फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसकी ‘कॉमेडी’ होनी चाहिए थी, लेकिन वही सबसे कमजोर साबित हुई. जबरदस्ती डाले गए फूहड़ जोक्स और गानों की धुनें फिल्म को और भी थकाऊ बना देती हैं. साथ ही, फिल्म के VFX का स्तर भी काफी औसत है.

क्या नॉस्टेल्जिया का दांव काम आया?

फिल्म बार-बार पुरानी फिल्मों की यादें भुनाने की कोशिश करती है. शूटिंग उसी जयपुर के ‘चोमू पैलेस’ में हुई है, जहां ‘भूल भुलैया’ जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्में बनी थीं. गानों की धुनें और कहानी का ढांचा भी पुरानी फिल्मों की याद दिलाता है, लेकिन यह सब अब आउटडेटेड लगता है. फिल्म अपना कोई नया या यादगार छाप छोड़ने में पूरी तरह नाकाम रही है.

⭐ रेटिंग: 2.5 / 5

First published on: Apr 17, 2026 08:26 PM

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