Lukkhe Review: अमेजन प्राइम वीडियो पर रिलीज हुई वेब सीरीज ‘लुक्खे’ काफी समय से चर्चा में थी. पंजाब के ड्रग्स माफिया, रैप कल्चर और क्राइम की दुनिया को दिखाने वाली इस सीरीज से काफी उम्मीदें थीं, लेकिन अगर सीधा और ईमानदार जवाब दिया जाए तो अगर आप इस वीकेंड ‘लुक्खे’ देखने का प्लान कर रहे हैं, तो शायद आप कुछ बेहतर कंटेंट चुन सकते हैं.
क्या है सीरीज की कहानी?
सीरीज की शुरुआत चंडीगढ़ से होती है, जहां हॉकी खेलते वक्त दो गुटों में लड़ाई हो जाती है, और यहीं से शुरू होती है. ड्रग्स, क्राइम और करप्शन की दुनिया. आगे की सीरीज बताती है, कि कैसे ड्रग्स की चपेट में आकर कैसे एक एक्सीडेंट होता है, जिससे कहानी में नया मोड़ आता है.
क्या है असल दिक्कत ?
OG और MC बदनाम के नाम के दो रैपर हैं, जो एक-दूसरे के राइवल हैं, और दिलचस्प बात ये है, कि दोनों ही ड्रग्स के बिजनेस से जुड़े हुए हैं. राशी खन्ना एक पुलिस ऑफिसर के किरदार में हैं, जो इस पूरे नेटवर्क का सफाया करने में जुटी हुई हैं. पलक तिवारी, किंग यानी बदनाम की बहन बनी हैं, जिनकी अपनी परेशानियां हैं, और वो रिहैब सेंटर तक पहुंच चुकी हैं. सबसे बड़ी समस्या कुछ भी नया नहीं लगता, असल दिक्कत यहां कहानी नहीं बल्कि उसका ट्रीटमेंट है.
कैसे काम करता पंजाब में ड्रग्स माफिया?
पंजाब में ड्रग्स माफिया कैसे काम करता है, युवा किस तरह इसकी चपेट में आते हैं, ये सब हम पहले भी कई फिल्मों और वेब सीरीज में देख चुके हैं. ऐसे में इस सीरीज के पास मौका था, कि वो अपने ट्रीटमेंट और स्टोरीटेलिंग से कुछ नया करे, लेकिन यहीं ‘लुक्खे’ सबसे बड़ी चूक कर जाती है. सीरीज में कुल 8 एपिसोड हैं, और कुछ एपिसोड के बाद ही आपको अंदाजा हो जाता है, कि आगे क्या होने वाला है? सस्पेंस और इमोशनल कनेक्ट दोनों ही कमजोर पड़ जाते हैं.
बहुत सारे किरदार, लेकिन कोई गहरा असर नहीं
सीरीज में कई किरदार हैं, और सबकी अपनी-अपनी लेयर्स भी हैं. ड्रग्स रैकेट कैसे चलता है? लोग कैसे इसकी गिरफ्त में आते हैं? इसे काफी डीटेल में दिखाने की कोशिश की गई है, लेकिन इसके बावजूद कुछ भी बहुत इंपेक्टफुल या एंगेजिंग नहीं बन पाता. कई जगह सीरीज सिर्फ शोर और स्टाइल में उलझी हुई महसूस होती है.
म्यूजिक और बैकग्राउंड स्कोर भी करता है निराश
सीरीज का म्यूजिक जरूरत से ज्यादा लाउड है, और जब कहानी पंजाब की रैप और म्यूजिक इंडस्ट्री के इर्द-गिर्द घूम रही हो, तब म्यूजिक का कैची ना होना सबसे बड़ी कमी बन जाता है. हां, रैप बैटल वाले हिस्से कुछ हद तक बेहतर लगते हैं, लेकिन बाकी जगह म्यूजिक सिर्फ बैकग्राउंड नॉइज बनकर रह जाता है.
एक्टिंग बनी सीरीज की सबसे बड़ी ताकत
अगर इस सीरीज का कोई सबसे बड़ा प्लस पॉइंट है, तो वो है इसके एक्टर्स की परफॉर्मेंस. किंग ने इस सीरीज से एक्टिंग डेब्यू किया है. ईमानदारी से कहूं तो उनसे उम्मीदें थीं, लेकिन उनका काम बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं कर पाता. राशी खन्ना और पलक तिवारी ने अच्छा काम किया है. वहीं लक्षवीर सरन का काम काफी अच्छा है.
डायरेक्शन और एडिटिंग कैसी है?
हिमांक गौर का डायरेक्शन कुछ नया या फ्रेश देने में सफल नहीं हो पाता. सीरीज के आइडियास और कॉन्सेप्ट में दम था, लेकिन एग्जीक्यूशन कमजोर पड़ जाता है. हालांकि, एडिटिंग का पेस काफी तेज है, और स्टोरी टेलिंग का तरीका थोड़ा अलग रखने की कोशिश की गई है, लेकिन एक वक्त के बाद ये इतना फास्ट पेस हो जाता है, कि सीन्स को इम्पेक्ट छोड़ने का भी मौका नहीं मिल पाता. इसके अलावा सिर्फ अलग स्टोरी टेलिंग से काम नहीं चलता कंटेंट में फ्रेशनेस और डेप्थ भी चाहिए होती है, और ‘लुक्खे’ यहीं मात खा जाती है. कई सीन्स वर्चुअली अच्छे लगते हैं, कुछ सीक्वेंस में इंटेंसिटी भी है, लेकिन प्रॉब्लम यही है, कि ऐसा बहुत कुछ हम पहले कई बार देख चुके हैं. इसलिए एक वक्त बाद सीरीज उबाऊ लगने लगती है.
फाइनल वर्डिक्ट
अगर आप पंजाब बेस्ड क्राइम ड्रामा और ड्रग्स माफिया वाली कहानियां पहले काफी देख चुके हैं, तो ‘लुक्खे’ शायद आपको बहुत ज्यादा नया या एक्साइटिंग नहीं लगेगा. सीरीज में पोटेंशियल था, अच्छे एक्टर्स भी थे, लेकिन कमजोर राइटिंग और प्रिडिक्टेबल ट्रीटमेंट की वजह से ये अपना इंपेक्ट खो देती है.