एक परिवार जिसकी नींव होते हैं माता-पिता, वो अपने बच्चों का पलान-पोषण करते हैं, और उनके उज्जवल भविष्य के लिए सपने संजोते हैं, इसी के साथ समय बीतता है, और बच्चे अपने आने वाले कल को बनाने के लिए अपने घर और माता-पिता को पीछे छोड़ बड़े शहरों में काम और अच्छी जिंदगी की तलाश में निकल पड़ते हैं, और पीछे छूट जाती हैं वो खूबसूरत यादें जिनमें उनका बचपन बीता होता है, जिनमें उनके मां-बाप का प्यार और डांट छिपी होती है, शहरों में बच्चे सेटेल होते हैं, अपना परिवार बसाते हैं, और पीछे उनके गांव और घर में अभी भी वो बुजुर्ग दंपति अपने बच्चों की वापसी की आस लगाए बैठा होता है. जिसका इंतजार हर दिन बढ़ता जाता है, समय बीतता है, लेकिन ये इंतजार कम नहीं होता. ऐसी दिल को छूने वाली जो आपको रुला देगी.
पलायन की दिल भर देने वाली कहानी
पहाड़ों से शहरों की ओर पलायन की ये कहानी जिसमें गांव में पीछे छूटे मां-बाप की जिंदगी कैसे बीतती है. उनके आंगन में पसरा सन्नाटा, बच्चों की वापसी की उम्मीद और उम्र के आखिरी पड़ाव पर एक-दूसरे का साथ देते बुजुर्ग दंपति की कहानी बड़े पर्दे पर जब सामने आई तो लोगों के दिल भर आए, आंखों से आंसू छलक पड़े. फिल्म की झोली में कई अवॉर्ड आ गए. जी हां नेशनल अवॉर्ड विनर डायरेक्टर विनोद कापड़ी की फिल्म ‘पायर’ इसी दर्द को बयां करती है.

क्या है ‘पायर’ की कहानी?
‘पायर’ उत्तराखंड के मुनस्यारी क्षेत्र के एक बुजुर्ग दंपती के जीवन से इंस्पायर्ड एक रियल स्टोरी है. जिसमें पलायन के बाद वीरान होते गांवों और पीछे छूटे बुजुर्ग माता-पिता की कहानी दिखाई गई है. जिनकी जिंदगी में केवल इंतजार ही सबसे बड़ा साथी होता है, वो एक ऐसे सपने को संजोय बैठे होते हैं, जो कभी पूरा नहीं होता है. आपको जानकर हैरानी होगी कि फिल्म में जिन किरदारों ने इस बुजुर्ग दंपति का रोल निभाया है, उन्होंने पहली बार कैमरे को फेस किया, इससे पहले उन्होंने किसी फिल्म में काम नहीं किया था और देखिए पहली ही बार में उन्होंने ऐसी छाप छोड़ी की पूरी दुनिया में उनकी अदाकारी का शो सुनाई दे रहा है.
पीछे छूटे मां-पिता का बढ़ता इंतजार
रोजगार और बेहतर भविष्य की तलाश में बच्चे शहरों की ओर बढ़ तो जाते हैं, लेकिन पीछ छूट जाते हैं उनके बूढ़े माता-पिता, जिनकी निगाहें हर आहट पर दरवाजे की ओर उठ जाती हैं. वो बांट जोहे बैठे रहते हैं, कि उनके घर की रौनक जल्द वापस लौटेगी, फिर उनका आंगन शोर और हंसी से गूंजेगा, उन्हें उम्मीद रहती है घर से निकले बच्चे जरूर वापस लौटेंगे, लेकिन समय गुजरता रहता है और इंतजार की घड़ियां और लंबी होती रहती हैं.

कहानी का सबसे भावुक पल
इसी अकेलेपन के बीच बुजुर्ग दंपती का एक-दूसरे के प्रति प्यार कहानी का सबसे भावुक पहलू बनता है. फिल्म सिर्फ पलायन की समस्या नहीं दिखाती, बल्कि यह भी याद दिलाती है कि उम्र के आखिरी पड़ाव पर साथ, अपनापन और किसी अपने की मौजूदगी कितनी अहम हो जाती है.
पद्म सिंह और हीरा देवी का अनुभव
फिल्म में पद्म सिंह और हीरा देवी मुख्य भूमिकाओं में हैं. दोनों पेशेवर कलाकार नहीं हैं. पद्म सिंह कापड़ी रिटायर्ड आर्मी मैन हैं, जबकि हीरा देवी गृहिणी और एक्स डांसर होती हैं. बावजूद इसके दोनों ने फिल्म में ऐसी छाप छोड़ी की पूरी दुनिया के दर्शक उनके फैन हो गए.

बुजुर्ग जोड़े के दर्द की कहानी
दोनों कलाकारों की खासियत उनकी सहजता और वास्तविक जीवन का अनुभव है. पर्दे पर उनका रिश्ता बनावटी नहीं लगता, बल्कि ऐसा महसूस होता है जैसे दर्शक किसी वास्तविक बुजुर्ग जोड़े की जिंदगी को करीब से देख रहे हों.
कैसा रहा डायरेक्टर का अनुभव?
निर्देशक विनोद कापड़ी के लिए इन कलाकारों तक पहुंचना और उनकी भावनाओं को पर्दे पर उतारना एक खास अनुभव रहा. उनके रिश्ते की सादगी और खामोशी ने फिल्म को वह भावनात्मक गहराई दी, जिसे पेशेवर अभिनय से हासिल करना हमेशा आसान नहीं होता.

विनोद कापड़ी को क्यों बनानी पड़ी यह फिल्म?
इस फिल्म के पीछे उत्तराखंड के एक ऐसे बुजुर्ग जोड़े की कहानी है, जिसने निर्देशक विनोद कापड़ी को भीतर तक प्रभावित किया. पहाड़ों से लगातार हो रहे पलायन के कारण खाली होते गांव और वहां अकेले रह गए बुजुर्गों की जिंदगी ने उन्हें इस विषय पर फिल्म बनाने के लिए प्रेरित किया.
परिवारों से सवाल करती कहानी
‘पायर’ के जरिए वह उस हकीकत को सामने लाने की कोशिश करते हैं, जो अक्सर शहरों की चमक-दमक के बीच नजरों से ओझल हो जाती है. यह कहानी उन परिवारों से भी सवाल करती है, जिनके माता-पिता गांव में रह जाते हैं और बच्चे बेहतर भविष्य की तलाश में दूर चले जाते हैं.

कब भारत में रिलीज होगी ‘पायर’?
फिल्म अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में पहले ही प्रदर्शित हो चुकी है और अब भारतीय दर्शकों तक पहुंचने जा रही है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, ‘पायर’ 30 अक्टूबर को सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है. फिल्म हिंदी और मलयालम भाषाओं में रिलीज होगी.
बड़े सितारों और भव्य सीन्स से जुदा है फिल्म
आपको जानकर हैरानी होगी , कि यह उन फिल्मों में शामिल है, जो बड़े सितारों या भव्य सीन्स के बजाय आम लोगों की जिंदगी और भावनाओं को ध्यान में रखकर बनाई गई है. आमा-बुबू की कहानी दर्शकों को अपने परिवार, अपने बुजुर्गों और उन रिश्तों की याद दिला सकती है, जिनकी अहमियत अक्सर दूर जाने के बाद समझ आती है.