Haiwaan Movie Review: किसी पुरानी कहानी को नए अंदाज में कहना आसान नहीं होता, क्योंकि दर्शक को अगर सब कुछ जाना-पहचाना लगे तो थ्रिलर का मजा आधा रह जाता है. प्रियदर्शन की ‘हैवान’ इसी चुनौती के बीच एक दिलचस्प रास्ता निकालती है. मलयालम फिल्म ‘ओप्पम’ की कहानी से बनी यह हिंदी अडॉप्टेशन अपने बेस से जुड़ी जरूर है, लेकिन स्क्रीन पर आते ही अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश करती है. यहां कहानी का रोमांच सिर्फ इस बात में नहीं है कि आगे क्या होगा, बल्कि इस बात में भी है कि आखिर कौन किससे कितना आगे है. अक्षय कुमार का परशुराम अपनी आम विलन वाली इमेज से बिल्कुल अलग एक खतरनाक और रहस्यमयी किरदार है, जबकि सैफ अली खान का श्याम देख नहीं सकता, लेकिन आवाजों और इंस्टिंक्ट के सहारे हर खतरे को महसूस करता है. दोनों के बीच शुरू होने वाला यह मुकाबला ताकत से ज्यादा दिमाग और सर्वाइवल का खेल बन जाता है. ‘हैवान’ की खास बात यही है कि यह ‘ओप्पम’ से कहानी लेती है, लेकिन उसे सिर्फ दोहराती नहीं, बल्कि हिंदी दर्शकों के लिए नए ट्रीटमेंट, नई कास्ट और अलग एनर्जी के साथ पेश करती है. अब सवाल है कि क्या यह नया अंदाज फिल्म को एक असरदार थ्रिलर बना पाता है? चलिए, जानते हैं.
क्या है ‘हैवान’ की कहानी?
‘हैवान’ की दुनिया में एंट्री लेते ही समझ आ जाता है कि यहां खेल सीधा नहीं है. फिल्म आपको एक ऐसे मुकाबले में ले जाती है, जहां एक तरफ है परशुराम और दूसरी तरफ श्याम. लेकिन मामला सिर्फ विलेन और हीरो का नहीं है. परशुराम खतरनाक है, मगर उसके खतरे की पूरी वजह तुरंत सामने नहीं आती. श्याम देख नहीं सकता, लेकिन उसकी सुनने और महसूस करने की क्षमता उसे कमजोर नहीं पड़ने देती. दोनों के बीच जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, वैसे-वैसे सवाल बढ़ते जाते हैं. कौन किसे ट्रैक कर रहा है? कौन पहले से एक कदम आगे है? और सबसे जरूरी जिसे हम शिकार समझ रहे हैं, क्या वाकई वही शिकार है? फिल्म इन सवालों के जवाब देने में जल्दबाजी नहीं करती और यही इसकी सबसे बड़ी ताकत बन जाती है.
अक्षय कुमार की एक्टिंग
अक्षय कुमार को आपने हीरो बनकर खूब एक्शन करते देखा है, लेकिन परशुराम में उनका अंदाज बिल्कुल अलग है. यहां उनका एक्शन से ज्यादा उनका ठहराव काम करता है. चेहरे पर ज्यादा एक्सप्रेशन नहीं, आवाज में ज्यादा उतार-चढ़ाव नहीं, लेकिन फिर भी स्क्रीन पर आते ही किरदार का दबदबा महसूस होता है. परशुराम ऐसा विलेन है जिसे देखकर आप उसके अगले कदम का अंदाजा लगाना चाहेंगे, लेकिन फिल्म हर बार आपको थोड़ा पीछे छोड़ देती है. अक्षय ने इस किरदार में जिस तरह का ठंडा और कंट्रोल्ड एटीट्यूड रखा है, वही उसे और खतरनाक बनाता है.
सैफ अली खान का अभिनय
सैफ अली खान का श्याम इस कहानी को बिल्कुल दूसरी दिशा देता है. नेत्रहीन होने के बावजूद श्याम खुद को बेबस नहीं दिखाता. वह आंखों की जगह अपनी सुनने की क्षमता, याददाश्त और इंस्टिंक्ट पर भरोसा करता है. यही चीज कई सीन्स को काफी टेंशन से भर देती है. जब श्याम किसी आवाज या आहट को पकड़ता है, तो दर्शक भी उसके साथ उस पल को महसूस करने लगता है. सैफ ने इस किरदार को ओवरड्रामेटिक बनाने के बजाय काफी नैचुरल रखा है. अक्षय का परशुराम जहां खतरा पैदा करता है, वहीं सैफ का श्याम उस खतरे को महसूस करके उससे निकलने की कोशिश करता है. दोनों की यही कॉन्ट्रास्टिंग स्क्रीन प्रेजेंस फिल्म के सबसे मजबूत हिस्सों में से एक है.
फिल्म की सपोर्टिंग कास्ट
पहल चौधरी के किरदार को लेकर ज्यादा कुछ बताना यहां ठीक नहीं होगा, क्योंकि उनकी कहानी जितनी कम पता हो, उतना बेहतर. फिल्म जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, उनका किरदार भी ज्यादा अहम और दिलचस्प होता जाता है. पहल ने इमोशनल हिस्सों को अच्छी तरह संभाला है और उनके किरदार में एक मासूमियत है जो कहानी के तनाव के बीच अलग असर छोड़ती है. सैयामी खेर, श्रिया पिलगांवकर और बोमन ईरानी कहानी को जरूरी सपोर्ट देते हैं. शारिब हाशमी पुलिस ऑफिसर के रोल में जांच को आगे बढ़ाते हैं, जबकि असरानी की मौजूदगी फिल्म में एक भावुक पल जोड़ती है.
हर पांच मिनट में नया ट्विस्ट
प्रियदर्शन जानते हैं कि थ्रिलर में हर राज पहली ही बार में खोल दिया जाए तो मजा खत्म हो जाता है. इसलिए ‘हैवान’ कई जगह आपको जानकारी देने के बजाय इंतजार करवाती है. फिल्म हर पांच मिनट में ट्विस्ट डालने की कोशिश नहीं करती, बल्कि माहौल और किरदारों के जरिए बेचैनी पैदा करती है. कई सीन्स में आपको लगता है कि अब आगे क्या होगा, इसका अंदाजा लग गया है, लेकिन कहानी उसी वक्त थोड़ा सा मोड़ ले लेती है. एक्शन जरूर है, लेकिन असली मजा उस माइंड गेम में है जो पर्दे के पीछे लगातार चलता रहता है. 2 घंटे 44 मिनट का रनटाइम लंबा जरूर है, लेकिन फिल्म का लगातार कुछ छिपाकर रखना इसकी रफ्तार को कई जगह संभाल लेता है.
फिल्म का म्यूजिक
प्रीतम का बैकग्राउंड स्कोर इस पूरे माहौल को और ऊपर ले जाता है. कई बार स्क्रीन पर बहुत कम हो रहा होता है, लेकिन बैकग्राउंड म्यूजिक आपको बता देता है कि कुछ गड़बड़ है. यही चीज थ्रिलर के अनुभव को मजबूत करती है. ‘मेरे हीरो हैं’ फिल्म के इमोशनल हिस्से को सपोर्ट करता है, जबकि ‘रंगियारा’ कहानी के सफर वाले पलों में थोड़ा हल्कापन लेकर आता है. म्यूजिक कहानी को दबाता नहीं, बल्कि उसके मूड को और स्ट्रॉन्ग करता है.
‘हैवान’ प्रियदर्शन की मलयालम फिल्म ‘ओप्पम’ का हिंदी अडॉप्टेशन है, लेकिन इसे सिर्फ रीमेक कहकर खत्म करना सही नहीं होगा. बेस कहानी वही है, लेकिन हिंदी वर्जन में इसे अपने दर्शकों और स्टार कास्ट के हिसाब से ट्रीट किया गया है. अक्षय और सैफ की मौजूदगी इस कहानी को अपना अलग रंग देती है. मोहनलाल की खास मौजूदगी भी ओरिजिनल फिल्म से एक खूबसूरत कनेक्शन बनाती है. हालांकि फिल्म के कुछ हिस्से ऐसे हैं जिनके बारे में जितना कम बताया जाए, उतना ही अच्छा है.
अक्षय का डार्क परफॉर्मेंस
आखिर में ‘हैवान’ आपको एक ऐसे खेल के बीच छोड़ती है जहां हर जवाब के साथ एक नया सवाल खड़ा होता है. अक्षय का डार्क परफॉर्मेंस, सैफ का शांत लेकिन सतर्क श्याम, पहल चौधरी का ट्रैक और प्रियदर्शन का धीरे-धीरे राज खोलने वाला अंदाज फिल्म को एक इंगेजिंग थ्रिलर बनाता है. यह परफेक्ट फिल्म नहीं है और कुछ जगह कहानी थोड़ी और टाइट हो सकती थी, लेकिन अगर आपको ऐसी फिल्में पसंद हैं जहां आप सिर्फ स्क्रीन नहीं देखते बल्कि हर सीन में अगली चाल का अंदाजा लगाने की कोशिश करते हैं, तो ‘हैवान’ आपको निराश नहीं करेगी. और हां, आखिरी हिस्से तक पहुंचते-पहुंचते एक बात जरूर समझ आ जाती है.