Prem Keetanu Movie Review:पहला प्यार भी बड़ी अजीब चीज़ है। एक मिस्ड कॉल पूरी कहानी बन जाती है, एक छोटा-सा मैसेज बार-बार पढ़ा जाता है और किसी की एक छोटी-सी बात को हम अपने दिमाग में दस अलग-अलग मतलब दे देते हैं. Prem Keetanu इसी उम्र और इसी उलझन को पकड़ती है. फिल्म शुरुआत में एक हल्की-फुल्की रोमांटिक कॉमेडी जैसी लगती है, लेकिन धीरे-धीरे यह प्यार से आगे बढ़कर दोस्ती, परिवार, करियर और जिंदगी में सही फैसले लेने की कहानी बन जाती है.
फिल्म में वीर पहाड़िया ने विशाल का किरदार निभाया है। विशाल एक बेफिक्र और थोड़ा-सा लापरवाह युवा है, जिसे अपनी जिंदगी को लेकर बहुत ज्यादा प्लानिंग करने की आदत नहीं है. कॉलेज में बैकबेंचर वाली जिंदगी, दोस्तों के साथ वक्त बिताना और चीजों को जैसा चल रहा है वैसा चलने देना, यही उसकी दुनिया है. फिर उसकी जिंदगी में सुहानी आती है.
फिल्म की कहानी
आफिया सैयद ने सुहानी के किरदार से डेब्यू किया है. सुहानी विशाल से काफी अलग है. प्रैक्टिकल, फोकस्ड और अपनी जिंदगी को लेकर ज्यादा स्पष्ट. शायद यही अंतर विशाल को उसकी तरफ खींचता है. विशाल को उससे प्यार हो जाता है और फिर शुरू होती है वही पुरानी लेकिन हमेशा दिलचस्प कहानी,क्या सामने वाला भी आपको पसंद करता है या नहीं?
कहानी में अपारशक्ति खुराना का रंजीत भी आता है और यहां फिल्म आसानी से एक सामान्य लव ट्राएंगल बन सकती थी. लेकिन Prem Keetanu ऐसा नहीं करती. रंजीत को कोई खलनायक नहीं बनाया गया है. उसके अपने तरीके हैं, अपनी कोशिशें हैं और सुहानी के पास भी अपनी पसंद और फैसले हैं. यही बात इस ट्राएंगल को थोड़ा ज्यादा दिलचस्प बनाती है.
फिल्म की कास्टिंग
वीर पहाड़िया विशाल के किरदार के लिए अच्छी कास्टिंग साबित होते हैं. उनका स्क्रीन प्रेजेंस सहज है और कॉमेडी वाले हिस्सों में वह बिना जरूरत से ज्यादा कोशिश किए हंसा देते हैं. लेकिन उनका असली काम फिल्म के उन हिस्सों में दिखाई देता है जहां विशाल को अपनी जिंदगी के बारे में गंभीरता से सोचना पड़ता है. धीरे-धीरे उसे एहसास होता है कि उसकी उलझन सिर्फ सुहानी को लेकर नहीं है. वह अपने करियर, परिवार और भविष्य को लेकर भी उतना ही कन्फ्यूज है.
आफिया सैयद की शुरुआत भी आत्मविश्वास से भरी है. विशाल और सुहानी के बीच की केमिस्ट्री फिल्म की खूबसूरत चीजों में से एक है. दोनों के बीच सब कुछ बहुत परफेक्ट नहीं लगता और शायद इसी वजह से उनकी कहानी ज्यादा वास्तविक महसूस होती है. उनकी बातचीत में एक तरह की झिझक और मासूमियत है, जो इस उम्र के प्यार को सही तरह से पकड़ती है.
अपारशक्ति खुराना रंजीत के किरदार में खूब मजा करते हैं. खासकर राकेश बेदी, जो सुहानी के पिता बने हैं, उनके साथ वाले सीन फिल्म के सबसे मजेदार हिस्सों में शामिल हैं. रंजीत का सुहानी के पिता को इंप्रेस करने की कोशिश करना कई बार कहानी से ज्यादा मजेदार हो जाता है. राकेश बेदी अपने अनुभव के साथ इन दृश्यों में सही कॉमिक टाइमिंग लेकर आते हैं.
लेकिन Prem Keetanu की असली खूबसूरती तब सामने आती है जब कहानी सिर्फ प्यार के बारे में नहीं रहती.
परिवार से कनेक्शन
विशाल और उसके माता-पिता का रिश्ता फिल्म का एक मजबूत हिस्सा है. यहां परिवार को न तो बहुत आदर्श दिखाया गया है और न ही बहुत खराब. प्यार है, लेकिन साथ ही गलतफहमियां भी हैं और बहुत-सी ऐसी बातें हैं जो कहने के बजाय मन में रह जाती हैं.
विशाल और उसके पिता के बीच एक फोन बातचीत खास तौर पर ध्यान खींचती है। विशाल फोन करता है और पिता का पहला सवाल होता है. ‘क्या चाहिए?’ सुनने में यह एक बिल्कुल सामान्य सवाल है, लेकिन इस एक लाइन के पीछे उनके पूरे रिश्ते की झलक दिखाई देती है।
कई भारतीय परिवारों में, खासकर पिता और बेटे के रिश्ते में, प्यार हमेशा ‘मैं तुमसे प्यार करता हूं’ कहकर नहीं जताया जाता. कभी वह खाने के बारे में पूछने में होता है, कभी पैसे भेजने में, कभी पढ़ाई या नौकरी के बारे में सवाल करने में. Prem Keetanu इस रिश्ते की इसी खामोशी को बिना ज्यादा ड्रामा किए समझती है.
कहानी में आया एक बड़ा मोड़
कहानी में एक और मोड़ तब आता है जब विशाल का US visa approve हो जाता है. जो खबर उसके लिए खुशी की होनी चाहिए थी, वही उसके लिए एक बड़ा सवाल बन जाती है. क्या वह चला जाए? क्या सुहानी के लिए रुकना सही होगा? अगर उसने एक चीज चुनी और दूसरी खो दी तो? यहीं फिल्म की कहानी सिर्फ ‘लड़की मिलेगी या नहीं’ से आगे निकल जाती है.
फिल्म की कॉमेडी भी लगातार उसका साथ देती है। विशाल और उसके रूममेट की दोस्ती में कई अच्छे पल हैं। रिश्तों को लेकर उसके रूममेट का अपना एक सिद्धांत है. किसी को वक्त दो तो उसे पैसे चाहिए, पैसे दो तो वक्त चाहिए और दोनों दो तो उसे स्पेस चाहिए. बात पूरी तरह सही हो या नहीं, लेकिन इतनी पहचान वाली है कि हंसी जरूर आती है.
फिल्म के गाने
“Kaho Toh,” “Tu Mera Raiyyo” और “Ishq Ka Ghulaam” जैसे गाने फिल्म के यंग और फ्रेश माहौल को बनाए रखते हैं. म्यूजिक कहानी से अलग नहीं लगता और फिल्म के रोमांटिक और रंगीन हिस्सों में अच्छी तरह घुल जाता है.
निर्देशक अपूर्व सिंह कार्की फिल्म को हल्का रखते हुए उसके इमोशनल हिस्सों को भी जगह देते हैं. दीपक किंगरानी की कहानी और स्क्रीनप्ले रोमांस, कॉमेडी और पारिवारिक रिश्तों को एक साथ लेकर चलते हैं। कुछ हिस्से थोड़े टाइट हो सकते थे, लेकिन फिल्म की गर्माहट और किरदारों के प्रति ईमानदारी उसे संभाल लेती है.
आखिर में Prem Keetanu की सबसे अच्छी बात यही है कि यह समझती है कि बड़ा होना किसी एक दिन अचानक नहीं होता.यह छोटी-छोटी चीजों से होता है. जब आप अपने माता-पिता को थोड़ा बेहतर समझने लगते हैं, जब दोस्त आपकी जिंदगी में आपकी सोच से ज्यादा जरूरी हो जाता है, जब प्यार आपको भविष्य के बारे में सोचने पर मजबूर करता है और जब आपको समझ आता है कि हर फैसला अपने साथ कुछ खोने का डर भी लेकर आता है.
रोमांस भी, कॉमेडी भी
Prem Keetanu एक ऐसी फिल्म है जो प्यार के बहाने जिंदगी की बात करती है. यह हंसाती है, रोमांस दिखाती है और बिना जरूरत इमोशनल होने की कोशिश किए कुछ ऐसी बातें कह जाती है जिनसे युवा दर्शक आसानी से जुड़ सकते हैं. वीर पहाड़िया फिल्म को सहजता और आकर्षण के साथ संभालते हैं, जबकि आफिया सैयद एक promising debut देती हैं. अपारशक्ति खुराना और राकेश बेदी कहानी में जरूरी हल्कापन बनाए रखते हैं.
फाइनल वर्डिक्ट
फिल्म कोई बिल्कुल नई प्रेम कहानी नहीं बताती, लेकिन परिचित भावनाओं को ईमानदारी और गर्माहट के साथ पेश करती है. वीर पहाड़िया और आफिया सैयद की केमिस्ट्री, अपारशक्ति खुराना की कॉमिक एनर्जी और परिवार के रिश्तों को लेकर फिल्म की संवेदनशीलता इसे एक खूबसूरत और मनोरंजक अनुभव बनाती है. Prem Keetanu आखिरकार सिर्फ इस सवाल पर खत्म नहीं होती कि विशाल को उसका प्यार मिलता है या नहीं, बल्कि इस एहसास के साथ खत्म होती है कि बड़े होने का मतलब हर सवाल का जवाब मिल जाना नहीं है. कभी-कभी सही सवाल पूछना और अपनी पसंद की जिम्मेदारी लेना ही पहला कदम होता है. और शायद इसी वजह से यह हल्की-फुल्की प्रेम कहानी खत्म होने के बाद भी अपने किरदारों और उनकी छोटी-छोटी उलझनों के साथ आपको मुस्कुराने की वजह देती रहती है.