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बॉलीवुड का वो विलेन, जो हर फिल्म में सुपरस्टार्स से भी ज्यादा वसूलता था फीस

बॉलीवुड के इतिहास में खलनायकों के दौर को अगर कोई एक नाम परिभाषित करता है, तो वह हैं अमरीश पुरी. उन्होंने न केवल विलेन की परिभाषा बदली, बल्कि यह भी साबित किया कि फिल्म में हीरो का होना जितना जरूरी है, एक दमदार विलेन का होना उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है. मोगैम्बो ('मिस्टर इंडिया') से लेकर 'नायक' के बलराज चौहान तक, उनका हर किरदार स्क्रीन पर एक खौफ और आकर्षण पैदा करता था. सेट पर अपनी गाड़ियां खुद चलाने वाले और बिना किसी पीए (PA) के काम करने वाले अमरीश पुरी, पर्दे के बाहर जितने सहज थे, पर्दे पर उतने ही खतरनाक.

'हीरो से एक रुपया ज्यादा' वाली शर्त:- अभिनेता सौरभ शुक्ला ने एक किस्सा साझा किया था कि अमरीश पुरी की मार्केट वैल्यू इतनी थी कि वे हमेशा यह सुनिश्चित करते थे कि उनकी फीस फिल्म के मुख्य हीरो से कम से कम एक रुपया ज्यादा हो. यह उनकी लोकप्रियता और इंडस्ट्री में उनकी अपरिहार्यता को दर्शाता था.

विलेन नहीं, फिल्म की 'शान'- अमरीश पुरी ने उस परंपरा को तोड़ा जिसमें माना जाता था कि फिल्म सिर्फ हीरो की होती है. उन्होंने दिखाया कि एक मजबूत विलेन कहानी की नींव होता है. उनकी आवाज का भारीपन और आंखों की चमक ही पूरी फिल्म को एक अलग स्तर पर ले जाती थी.

खुद गाड़ी चलाने का जुनून- करोड़ों की कमाई के बावजूद वे सादगी की मिसाल थे. वे न केवल सेट पर खुद गाड़ी चलाकर जाते थे, बल्कि उन्होंने अपने पूरे करियर में कभी कोई निजी सेक्रेटरी, ड्राइवर या स्टाफ नहीं रखा. वे एक स्वतंत्र कलाकार की तरह जीना पसंद करते थे.

उनका व्यावहारिक (Practical) नजरिया- जब उनसे स्टाफ न रखने का कारण पूछा गया, तो उन्होंने बहुत ही मजाकिया और व्यावहारिक जवाब दिया था. उन्होंने कहा था, "पैसे मैं कमाऊं और बांटता रहूं स्टाफ में!" यह दिखाता है कि वे अपनी मेहनत की कमाई का हिसाब-किताब रखने में कितने सचेत थे.

थिएटर से ग्लोबल फेम तक- अमरीश पुरी का सफर रंगमंच से शुरू हुआ था. उनकी प्रतिभा केवल बॉलीवुड तक सीमित नहीं थी; उन्होंने स्टीवन स्पीलबर्ग की अंतरराष्ट्रीय फिल्म 'इंडियाना जोन्स एंड द टेंपल ऑफ डूम' में भी काम किया और दुनिया भर में अपने अभिनय का लोहा मनवाया.