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आंखों से खौफ पैदा करने वाला विलेन, जिसकी मौजूदगी से कांप उठता था थिएटर, उसके निधन पर रोया था पूरा बॉलीवुड

बॉलीवुड और साउथ सिनेमा में जब भी खतरनाक विलेन की बात होती है, कुछ चेहरे अपने आप सामने आ जाते हैं. इन्हीं में से एक नाम है, इस विलेन का... जिनकी आंखों में ऐसा खौफ था, कि हीरो ही नहीं, दर्शकों के भी पसीने छूट जाते थे.

फिल्मों में विलेन का रोल तभी असरदार माना जाता है, जब वो हीरो पर भारी पड़े. जैसे गब्बर सिंह या मोगेम्बो ने अपनी अलग पहचान बनाई, वैसे ही इस विलेन ने इंडस्ट्री में अपनी धाक जमाई, जिसका नाम रामी रेड्डी है, जिन्होंने बिना ज्यादा शोर-शराबे के डर पैदा करने का अपना अनोखा अंदाज बनाया.

उनका शांत चेहरा, मुंडा हुआ सिर और लाल आंखें ही काफी थीं, माहौल बदलने के लिए... करीब 250 फिल्मों में काम कर चुके रामी रेड्डी की सबसे बड़ी ताकत उनका डायलॉग बोलने का तरीका था.

वो बिना आवाज ऊंची किए, एक ही टोन में डायलॉग बोलते थे, जो और ज्यादा डरावना लगता था. फिल्म 'वक्त हमारा है में' कर्नल शिकारा का उनका किरदार आज भी याद किया जाता है. वहीं 'हकीकत' में अन्ना के रोल ने भी उन्हें अलग पहचान दिलाई.

कम ही लोग जानते हैं, कि फिल्मों में आने से पहले रामी रेड्डी पत्रकार थे. उन्होंने Osmania University से जर्नलिज्म की पढ़ाई की और अखबार में काम भी किया, लेकिन एक्टिंग का जुनून उन्हें फिल्मी दुनिया में खींच लाया.

1989 की तेलुगू फिल्म अंकुशम से उन्हें बड़ी पहचान मिली. इस फिल्म का डायलॉग 'स्पॉट पेदथा' इतना हिट हुआ, कि वो रातोंरात स्टार बन गए. बाद में 'हिंदी रीमेक प्रतिबंध' में भी उन्होंने वही किरदार निभाकर बॉलीवुड में अपनी जगह बना ली.

अपने करियर के शिखर पर पहुंच चुके रामी रेड्डी की जिंदगी में 2010 में बड़ा झटका लगा, जब उन्हें लिवर कैंसर का पता चला. बीमारी तेजी से बढ़ी और उनकी हालत बिगड़ती चली गई, जो कलाकार पर्दे पर बेहद ताकतवर नजर आता था, वो असल जिंदगी में इस बीमारी से जूझता रहा.

आखिरकार 14 अप्रैल 2011 को हैदराबाद में उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया. महज 52 साल की उम्र में उनका जाना फिल्म इंडस्ट्री के लिए बड़ी क्षति था. आज भी 90 के दशक की फिल्मों का जिक्र होता है, तो रामी रेड्डी का नाम जरूर लिया जाता है. उन्होंने साबित किया, कि असली डर पैदा करने के लिए ऊंची आवाज नहीं, बल्कि आंखों का असर ही काफी होता है.