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बॉलीवुड का सबसे घातक विलेन, जो फिल्मों में हीरो से भी ज्यादा लेता था फीस
बॉलीवुड के 100 साल के सफर में खलनायकों का एक सुनहरा दौर रहा है, जहां प्राण, प्रेम चोपड़ा और अमजद खान जैसे सितारों ने अपनी दहशत से दर्शकों के दिल जीते. लेकिन इन सबके बीच अमरीश पुरी एक ऐसे धुरंधर बनकर उभरे, जिन्होंने विलेन की परिभाषा ही बदल दी. फिल्म 'मिस्टर इंडिया' का मोगैम्बो हो या 'नायक' का भ्रष्ट मुख्यमंत्री, उनकी आंखों की चमक और आवाज का भारीपन पर्दे पर जादू पैदा कर देता था. वे न केवल एक बेहतरीन अभिनेता थे, बल्कि अपने दौर के सबसे महंगे सितारों में से एक थे. सादगी भरी निजी जिंदगी और पर्दे पर अपनी शर्तों पर काम करने वाले अमरीश पुरी की स्टारडम ऐसी थी कि वे मेकर्स से हीरो से भी अधिक फीस वसूलने का दम रखते थे.
बॉलीवुड के 100 साल के सफर में खलनायकों का एक सुनहरा दौर रहा है, जहां प्राण, प्रेम चोपड़ा और अमजद खान जैसे सितारों ने अपनी दहशत से दर्शकों के दिल जीते. लेकिन इन सबके बीच अमरीश पुरी एक ऐसे धुरंधर बनकर उभरे, जिन्होंने विलेन की परिभाषा ही बदल दी. फिल्म 'मिस्टर इंडिया' का मोगैम्बो हो या 'नायक' का भ्रष्ट मुख्यमंत्री, उनकी आंखों की चमक और आवाज का भारीपन पर्दे पर जादू पैदा कर देता था. वे न केवल एक बेहतरीन अभिनेता थे, बल्कि अपने दौर के सबसे महंगे सितारों में से एक थे. सादगी भरी निजी जिंदगी और पर्दे पर अपनी शर्तों पर काम करने वाले अमरीश पुरी की स्टारडम ऐसी थी कि वे मेकर्स से हीरो से भी अधिक फीस वसूलने का दम रखते थे.
हीरो से 'एक रुपया' ज्यादा फीस- अमरीश पुरी की मार्केट वैल्यू का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे अक्सर फिल्म के लीड हीरो से भी ज्यादा फीस लेते थे. अभिनेता सौरभ शुक्ला ने खुलासा किया था कि अमरीश जी की यह शर्त होती थी कि उन्हें हीरो से कम से कम एक रुपया ज्यादा दिया जाए, जो उनके आत्मसम्मान और डिमांड को दर्शाता था.
खुद की गाड़ी और कोई स्टाफ नहीं- करोड़ों कमाने के बावजूद वे अपनी निजी जिंदगी में बेहद सादे थे. उनके पास न कोई सेक्रेटरी था और न ही कोई ड्राइवर. वे खुद गाड़ी चलाकर सेट पर आते थे और अपने सारे काम खुद ही मैनेज करना पसंद करते थे.
व्यावहारिक सोच (Practical Mind)- जब सौरभ शुक्ला ने उनसे स्टाफ न रखने की वजह पूछी, तो उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा था, “पैसे मैं कमाऊं और बांटता रहूं स्टाफ में!” यह जवाब दिखाता है कि वे अपनी मेहनत की कमाई की कद्र करना बखूबी जानते थे.
थिएटर से हॉलीवुड तक का डंका- रंगमंच (थिएटर) से अपनी पहचान बनाने वाले अमरीश पुरी ने न केवल हिंदी, बल्कि पंजाबी, कन्नड़ और हॉलीवुड (स्टीवन स्पीलबर्ग की 'इंडियाना जोन्स') तक अपनी अदाकारी का लोहा मनवाया.
विलेन नहीं, फिल्म की जान- 12 जनवरी 2005 को भले ही वे दुनिया छोड़ गए, लेकिन उनकी विरासत आज भी जिंदा है. उन्होंने यह परंपरा खत्म की कि फिल्म सिर्फ हीरो की होती है; उन्होंने दिखाया कि एक मज़बूत विलेन ही कहानी को यादगार बनाता है.
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