Paatal Lok Season 2 Review: 5 साल पहले प्राइम वीडियो पर पाताल लोक आई, तो एक झटका सा लगा कि ऐसी कहानी कहने का जिगरा सिर्फ ओटीटी में हो सकता है। एक न्यूज स्टूडियो के प्राइम टाइम एंकर के अटेम्प्ट टू मर्डर केस की गुत्थियां सुलझाते हुए, दिल्ली के जमनापार थाने का इंस्पेक्टर हाथीराम सस्पेंड होने के बावजूद जब स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल के बीच की कड़ियां खोलना शुरू करता है तो तूफान आ जाता है। पंजाब के दलितों पर सवर्णों के अत्याचार की परतें सामने आती है। दिल्ली के निजामुद्दीन स्टेशन के आस-पास गिजगिजाते बाल यौन उत्पीड़न की दर्दनाक झलक मिलती हैं।
मीडिया के अंदर खबरों में चटकारे लेने और पैसों के लेंस में जाकर बदलती खबरों का सच सामने आता है। देश की नसों में इंजेक्ट होते इस्लामोफोबिया का अहसास होता है, सियासत और अपराध की तारें खुलती हैं, बहनों के रेप का बदला लेने वाले हथौड़ा त्यागी का सत्ता के लिए इस्तेमाल दिखता है। 9 एपिसोड के पाताल लोक की इस छोटी सी कहानी में भारत के स्वर्ग के नीचे बिजबिजाते पाताल की झलक दिखाते – एक क्लाइमेक्स भी था कि अगर आप कुत्तों को प्यार करते हैं, तो अच्छे इंसान हैं। अब ये क्लाइमेक्स जितना भी अटपटा हो लेकिन आपको पूरे पाताल लोक के हंगामे के फिनाले के तौर पर यकीन दिलवा देता है। वैसे ये भी दिलचस्प है कि पाताल लोक के सेकंड सीजन का पहले सीजन से जरा भी कनेक्शन नहीं है।
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सेकंड सीजन की कहानी
सेकंड सीजन की स्टोरी नागालैंड सदन में वहां के एक बड़े लीडर जॉनथम थॉम के मर्डर से शुरू होती है। थॉम दिल्ली और नागालैंड के बीच 20 हजार करोड़ की इन्वेस्टमेंट और पीस प्रोसेस की अहम कड़ी था। हाथीराम चौधरी की जुबान कहें तो स्वर्ग के जॉनथम थॉम की मौत और पाताल लोक के कीड़े यानी एक दिहाड़ी मजदूर रघु पासवान की गुमशुदगी के तार एक नाइट क्लब में फ्लोर पर डांस करने वाली लड़की रोज लिजो से जुड़ते हैं और बवंडर आ जाता है।
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पाताल लोक सीजन 2 के 8 एपिसोड में ये कहानी म्यांमार से दिल्ली के बीच ड्रग्स की तस्करी और नागालैंड के जरिए इसका ट्रांसपोर्टेशन दिखाया है। वहीं देश के नॉर्थ-ईस्ट स्टेट में लोकल लीडर्स के बड़े-बड़े वादों में उम्मीद की रोशनी खोजते हुए, वहां के लोग उनकी उम्मीदों को छलते हुए करप्ट पॉलिटिशियन, रिबेल ग्रुप्स के टकराव में बिखरते परिवार और फिर जुर्म का रास्ता अपनाते अनाथ बच्चे, ड्रग्स के फेर में डूबते नौजवान और इंटर-स्टेट पुलिस को-ऑपरेशन के नाम पर एक-दूसरे के लिए स्पीड ब्रेकर बनाता पुलिस-पॉलिटिक्स नेक्सस की कहानी को दिखाता है। वहीं दूसरी ओर जरा-जरा से पैसों के लिए अपनो का खून करने वाले पाताल लोक के निवासी और फिर बेटे और बीवी की उम्मीदों को बार-बार कोशिश करके भी पूरा न कर पाने वाला– इंस्पेक्टर हाथीराम चौधरी जो छेद से भरी नाव जैसे सिस्टम पर सवार होकर खुद को डूबने से बचाने की जगह उसी नाव को बचाने की कोशिश करता रहता है।
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पहले और दूसरे सीजन में क्या कॉमन?
पाताल लोक के पहले और दूसरे सीजन में बस कुछ चीजें कॉमन हैं। पहली कि सस्पेंड होकर भी नौकरी और ड्यूटी में से हमेशा ड्यूटी को चुनने वाले इंस्पेक्टर हाथीराम चौधरी के अंदर का जज्बा अभी खत्म नहीं हुआ है। दरोगा इमरान अंसारी, पढ़ाई करके IPS बन गए हैं और सीनियर ऑफिसर बनने के बाद भी हाथीराम की ईमानदारी के कायल हैं। SHO विर्क प्रमोट होकर नॉरकोटिक्स में DCP हो गए हैं, दूसरों की मेहनत का क्रेडिट भले ही वो बेरहमी से छीनते हों मगर कुछ इंसानियत तो उनमें भी बाकी है।
यूपी, हरियाणा और दिल्ली से आगे बढ़कर, नॉर्थ-ईस्ट में पाताल लोक की कहानी को सेट करना अपने आप में बहुत रिस्की मामला था। खास तौर पर तब, जब पिछले कुछ साल से ये पूरा रीजन एथनिक क्लैश से जल रहा है। ऐसे में पाताल लोक का ये सेकेंड सीजन नॉर्थ ईस्ट के दर्द को दिखाने वाली एक खिड़की बन जाता है।
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हालांकि पाताल लोक के इस सेकंड सीजन के बनने की शुरुआत कोरोना के फैलने के पहले ही हो गई थी और इसे बनते और रिलीज होते पूरे पांच साल लग गए हैं। डायरेक्टर अविनाश अरुण और सुदीप ने पाताल लोक की कहानी और किरदारों में नेचुरल प्रोगेशन के साथ इस सीक्वल को पहले पार्ट जितना ही धारदार बनाया है, जिसकी कहानी आपको उलझाती है, गिराती है मगर इससे बाहर निकलने नहीं देता।
पहले एपिसोड में ही भरपूर रोमांच
पहले एपिसोड के पहले सीन से ही इन्वेस्टीगेशन का ऐसा चक्रव्यूह रच दिया जाता है कि आप इसमें इंस्पेक्टर हाथीराम चौधरी और ACP इमरान अंसारी और SP मेघना बरूआ को इसे तोड़ते देखते रहते हैं। जिसमें बारी-बारी से हाथीराम के अलावा सब धराशायी होते रहते हैं और आपको झटका लगता रहता है।
नागालैंड सदन से लेकर बिजनेस सम्मिट के सेटअप तक, जमनापार के थाने से लेकर-फल-मंडी और फिर पॉश नाइट क्लब से लेकर नागालैंड को फिल्माने और दिखाने तक इतनी डिटेलिंग है कि आपको समझ आता है कि पाताल लोक को बनने में इतना वक्त क्यों लगा है।
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कास्ट की एक्टिंग
जयदीप अहलावत को जब 5 साल के बाद आप दोबारा इंस्पेक्टर हाथीराम चौधरी बने देखते हैं, तो एक बार तो अहसास ही नहीं होता कि इस किरदार से आप इतने लंबे अरसे के बाद मिल रहे हैं। जयदीप तब से अब तक स्टार बन चुके हैं, लेकिन हाथीराम के किरदार में उन्हें पिटते देख, हांफते देख, चिढ़ते देख और फिर लड़ते देख पता चल जाता है कि ये क्या कमाल का एक्टर है। शायद इस दौर के सबसे बेहतरीन एक्टर्स में से एक। SP मेघना बरूआ के किरदार में तिलोत्तमा सोम को देखना भी ऐसा ही तर्जुबा है। ACP इमरान अंसारी बने इश्वाक सिंह ने अपने किरदार की मासूमियत बनाए रखी है। रेनू चौधरी बनी गुल पनाग अपने छोटे-छोटे सीन्स में बड़ा असर छोड़ती हैं।
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पाताल लोक में हैरान करते हैं दो बेहतरीन डायरेक्टर्स। पद्मश्री और पद्म भुषण। जाह्नू बरुआ को अंकल केन बने देखकर अहसास होता है कि ये बेहतरीन डायरेक्टर कितने कमाल एक्टर है। साथ ही फिर नागेश कुकनूर ने कपिल रेड्डी के किरदार में जान डाल दी है।
फाइनल वर्डिक्ट
पाताल लोक सीजन-2 के 40 से 46 मिनट वाले ये 8 एपिसोड्स किसी चक्रव्यूह से कम नहीं है, जिसे एक बार आपने देखना शुरू कर दिया, तो अंत होने के पहले उठना नामुमकिन है। इस पाताल लोक के सेकंड सीजन को 4 स्टार।