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अगर पहली फिल्म के बाद टूट जाते BR Chopra, तो कभी नहीं बनती ‘महाभारत’, जानें उनकी स्ट्रगल से सक्सेस तक की कहानी
BR Chopra Birth Anniversary Special: मनोरंजन जगत में बीआर चोपड़ा का नाम आज भी बेहद सम्मान के साथ लिया जाता है. 22 अप्रैल को उनके जन्मदिन के मौके पर आज हम आपको उनकी जिंदगी की कहानी के बारे में बताएंगे, जो किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं लगती जिसमें संघर्ष, असफलता और फिर ऐतिहासिक सफलता का बेहतरीन कॉम्बो देखने को मिलेगा.
1914 में जन्मे बीआर चोपड़ा ने अपने करियर की शुरुआत फिल्मों से नहीं, बल्कि पत्रकारिता से की थी, लेकिन किस्मत ने उन्हें सिनेमा की दुनिया में खींच लाया. साल 1947 के बंटवारे ने उनकी जिंदगी बदल दी. उन्हें अपना घर छोड़कर पहले दिल्ली और फिर मुंबई आना पड़ा. नए शहर में नई शुरुआत आसान नहीं थी, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी.
साल 1948 में उन्होंने फिल्म 'करवट' से डायरेक्शन की शुरुआत की, जो बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप साबित हुई. ये वो मोड़ था, जहां कई लोग हार मान लेते, लेकिन बीआर चोपड़ा ने खुद पर भरोसा बनाए रखा. उनकी मेहनत रंग लाई, और 1951 में आई फिल्म 'अफसाना' ने उन्हें बड़ी सफलता दिलाई.
इसके बाद उन्होंने एक से बढ़कर एक फिल्में दीं. फिल्म 'नया दौर' में उन्होंने आशा भोसले को बड़ा मौका दिया. इस फिल्म का गाना 'उड़े जब-जब जुल्फें तेरी' आज भी लोगों की जुबान पर है. वहीं, जब एक विदेशी फिल्ममेकर ने हिंदी फिल्मों में गानों का मजाक उड़ाया, तो बीआर चोपड़ा ने फिल्म 'कानून' बनाई, बिना एक भी गाने के... ये फिल्म सुपरहिट रही और उन्होंने क्रिटिक्स को करारा जवाब दिया.
हालांकि, उनकी सबसे बड़ी पहचान बनी टीवी सीरियल 'महाभारत' से, 1980 के दशक में जब ये शो ब्रॉडकास्ट होता था, तो सड़कों पर सन्नाटा छा जाता था. लोग अपने सारे काम छोड़कर इसे देखने बैठ जाते थे. कहा जाता है, कि उस समय इसे बनाने में करीब 9 करोड़ रुपये खर्च हुए थे, जो उस दौर के हिसाब से बहुत बड़ी रकम थी.
वहीं, द्रौपदी के किरदार के लिए पहले जूही चावला को चुना गया था, लेकिन बिजी शेट्यूल की वजह से ये रोल रूपा गांगूली को मिला, और उन्होंने इस किरदार को हमेशा के लिए अमर बना दिया.
बीआर चोपड़ा को उनके योगदान के लिए दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया. 94 साल की उम्र में उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा, लेकिन उनकी बनाई कहानियां आज भी दर्शकों के दिलों में जिंदा हैं.