Satluj: भारत के फिल्मों के सेंसरशिप को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है. इस विषय पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने साफ कहा कि बिना वैध सेंसर सर्टिफिकेट के किसी फिल्म की स्क्रीनिंग या स्ट्रीमिंग कानूनी तौर पर गलत है. ये टिप्पणी खासकर फिल्म ‘सतलुज’ के मामले की सुनवाई के दौरान की गई, जहां बिना सर्टिफिकेशन के इस फिल्म के प्रदर्शन को लेकर सवाल उठे. कोर्ट ने ओटीटी प्लेटफॉर्म पर भी सख्ती दिखाई.
बिना सर्टिफिकेशन स्ट्रीमिंग करना कानून का उल्लंघन
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि किसी भी फिल्म को बिना आवश्यक सर्टिफिकेट के सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करना या स्ट्रीम करना कानून का उल्लंघन है. कोर्ट ने कहा, ऐसे मामलों में आपराधिक कार्रवाई करने की प्राथमिक जिम्मेदारी संबंधित राज्य सरकार की होती है. यदि किसी फिल्म का प्रदर्शन नियमों के खिलाफ किया जाता है, तो राज्य सरकार को कानून के अनुसार उचित कदम उठाने चाहिए.
Zee5 पर भी हो सकती है कार्रवाई
सुनवाई में कोर्ट ने ये भी कहा कि इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) या केंद्र सरकार के पास भी ये अधिकार है कि बिना सर्टिफिकेशन के स्ट्रीम की जा रही फिल्म को हटाने का निर्देश दे. सुप्रीम कोर्ट ने ये भी संकेत दिया कि बिना आवश्यक प्रमाणन के फिल्म को स्ट्रीम करने वाले इंटरमीडियरी, यानी ओटीटी प्लेटफॉर्म Zee5 की भूमिका की भी जांच की जा सकती है.

आगे अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में संबंधित प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी तय करना जरूरी है और उसके खिलाफ कार्रवाई किए जाने पर भी विचार किया जा रहा है. फिल्म सतलुज के अचानक ओटीटी रिलीज और फिर इसे 48 घंटे के अंदर ही हटा देने के बाद ये मामला तेजी से चर्चा में बना हुआ है. वहीं अब कोर्ट की सुनवाई ने एक बार फिर ओटीटी प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कंटेंट के नियमन और फिल्म प्रमाणन प्रक्रिया को लेकर बहस तेज कर दी है.