Monday, November 28, 2022
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Laal Singh Chaddha Review: ‘लाल सिंह चढ्ढा’ बने आमिर आपको, आपसे मिलाते हैं, ‘फॉरेस्ट गंप’ से आगे जाते हैं।

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8 बरस लंबा इंतज़ार ख़त्म हुआ और आमिर ख़ान की लाल सिंह चढ्ढा रिलीज़ हो चुकी है। सोशल मीडिया के शूरवीरों ने इस फिल्म को इतना बायकॉट कहा है, कि उन्हे ये फिल्म देखकर समझ आ जाएगा कि वो ‘मलेरिया’ से पीड़ित है। 6 एकेडेमी अवॉर्ड जीत चुकी फिल्म को रीमेक करने की कोशिश, एक पागलपन और यकीन मानिए इस पागलपन को अगर कोई कर सकने का हौसला, हिम्मत और सलाहियत रखता है तो वो सिर्फ़ और सिर्फ़ आमिर ख़ान हैं।

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रीमेक और एडॉप्शन को कॉपी कहने वाले सोशल मीडिया के फिल्म पंडितों को ये समझ तक नहीं है, कि हर अच्छी कहानी वक्त और सरहद की बंदिशों को तोड़ती है। अपने-अपने संस्कार और रंग लेकर ये कहानी थोड़े बदले रूप के साथ नए सिरे से कही जाती है और लेकिन कहानी की मूल भावना वही रहती है। इसे एडॉप्शन कहते हैं, जो हमारी दादी-नानी की कहानियों में झलकती है। लाल सिंह चढ्ढा ऐसा ही हुनर लेकर आगे बढ़ती है। टॉम हैंक्स की बेहद खूबसूरत फॉरेस्ट गंप का वक्त और देश के हिसाब से निखरा रूप है लाल सिंह चढ्ढा।

अब कहानी पर आते हैं। पंजाब के पठानकोट के छोटे से गांव करौली से लाल की कहानी शुरु होती है, जहां उसकी मां गुरप्रीत, लाल को पालती है। पिता बस तस्वीर में दिखते हैं। छोटा लाल, पैरों और दिमाग़ दोनो से कमज़ोर है। उसके पैरों में ब्रेसेज़ लगाए जाते है, जिसके सहारे से चल सके और दिमाग़ तो उसका बड़ो-बड़ों के मुकाबले ज़्यादा अच्छे से चलता है, क्योंकि लाल का दिमाग़ नफरत नहीं समझता, तंज नहीं समझता… समझता है तो बस प्यार की बोली। मां, लाल को समझाती है कि वो किसी से कम नहीं। स्कूल में जब लाल को एडमिशन नहीं मिलता, तो मां गुरप्रीत लाल को लेकर फादर के पास जाती है। वहां डर लगता है कि फारेस्ट गंप की मां की तरह कहीं लाल की मां, ऐसा तो नहीं कुछ करेगी, जिसे बर्दाश्त करना मुश्किल हो। बस यहीं से अतुल कुलकर्णी की कहानी का रंग और निखरना शुरु होता है, फारेस्ट गंप सही मायनों में हिंदुस्तानी हो जाती है। लाल को रूपा मिलती है, दोस्ती और प्यार का मतलब समझ आता है। रूपा के रोने पर, लाल घुटनों पर बैठकर रूपा की मन्नत पूरी होने की दुआ मांगता है।

लाल सिंह चढ्ढा, 1971 से लेकर नए हिंदुस्तान तक की हर ज़रूरी वाकए की गवाह बनती है। एमरजेंसी के दौर से झलक, स्वर्ण मंदिर के परिसर में हुई भिंडरवाले और इंडियन आर्मी के बीच मुठभेड़, इंदिरा गाधी की हत्या, उसके बाद सड़कों पर खेली गई ख़ून की होली। आप सब कुछ देखते हैं महसूस करते हैं। लाल उनके सामने से होते हुए भी उनसे अछूता रहता जाता है। ये खूबी है इस कहानी की। दिल्ली की छत पर शाहरुख़ ख़ान की एंट्री पर आप सीटियां और तालियां ना बजाएं, तो पैसे वापस की गारंटी है।

लाल कृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा, बाबरी मस्ज़िद का तोड़ा जाना, मुंबई की सड़कों पर बम ब्लास्ट से लेकर करगिल के युद्ध तक की तस्वीर लाल सिंह चढ्ढा में ऐसे चुनी और बुनी गई है, कि आप राइटर, डायरेक्टर और एक्टर तीनों के लिए तालियां बजाते रहेंगे।

अबु सलेम और मोनिका बेदी की कहानी को लाल सिंह चढ्ढा और रूपा से जैसे जोड़ा गया है, वो इस कहानी को और खूबसूरत बना देता है। रूपा से मिलने जाने के लिए ट्रेन में लाल जब अपनी कहानी सुनाता है, तो आप उस कहानी को सुनते हैं, समझते हैं और उसमें खोते जाते हैं। रूपा अंडरगारमेंट की पूरी कहानी को लाल सिंह चढ्ढा में जैसे सुनाया गया है, उसके बाद आप रूपा कंपनी की असली कहानी को मानने से इनकार कर देंगे।

बाला और लाल की दोस्ती का ट्रैक, तो पूछिए नहीं कि क्या रंग दिखाता है। पूरा फर्स्ट हॉफ़ इस कहानी, इस दोस्ती की वजह से उठता चला जाता है। रूपा और लाल की दोस्ती, प्यार, दर्द और साथ की कहानी, हर उस दिल को छुएगी, जिसने ज़िंदगी मे एक सेकेंड के लिए भी प्यार किया है।

पाकिस्तान के टेरेरिस्ट मुहम्मद को करगिल वॉर के दौरान बचाने वाला लाल, उसे बदल देता है। उसे इंसानियत सीखा देता है। ये ट्रैक भले ही लोगों को पचे नहीं, लेकिन उम्मीद आप ऐसी ही करते हैं कि काश ऐसा ही होता। लाल दोस्ती निभाता है, प्यार निभाता है, ज़िंदगी को वैसे जीता है जैसी जीनी चाहिए।

फिल्म का हर एक गाना, हर एक लोकेशन, हर एक स्पेशल इफेक्ट और हर एक मोड़ जैसे एक सबक है। सिनेमा का सबसे खूबसूरत सबक। लाल के किरदार के लिए आमिर और रूपा के किरदार के लिए करीना की डी-एजिंग जैसे की गई है, उसे देखकर, थियेटर के अंदर ऐसा कोई भी शख़्स नहीं था, जिसकी आंखें फटी की फटी नहीं रह गईं।

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परफॉरमेंस के तो क्या ही कहने, आमिर ख़ान हिंदुस्तान के सिनेमा के कोहिनूर हैं, जो बेशक़ीमती है। करीना ने फिर एक बार साबित किया है कि अच्छे किरदार के लिए वो किसी भी हद तक जा सकती हैं। नागा चैतन्य ने बाला के किरदार में खुद को खो दिया है। मुहम्मद भाई बने मानव विज कमाल के हैं। और सबसे ज़्यादा तालियां बजनी चाहिए मोना सिंह के लिए, क्या कमाल की अदाकारा हैं वो। लाल और रूपा के किरदार के बचपने का किरदार निभाने वाले अहमद और हफ़सा को बहुत सारा प्यार।

लाल सिंह चढ्ढा देखिए, क्योंकि ये फिल्म आपको आपसे मिलाती है। फॉरेस्ट गंप के आगे जाती है। और हां ये ‘मलेरिया’ का ईलाज भी करती है।

लाल सिंह चढ्ढा को 4 स्टार

 

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