Saturday, 14 March, 2026

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OTT पर सस्पेंस से भरपूर शानदार मिस्ट्री थ्रिलर फिल्म, क्लाइमेक्स देख लगेगा झटका

भारतीय न्याय व्यवस्था और समाज की सोच को झकझोर देने वाली फिल्म 'तलवार' सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि एक कड़वा सच है. प्राइम वीडियो पर मौजूद यह मास्टरपीस हमें साल 2008 के उस अंधेरे हत्याकांड की याद दिलाती है, जिसने पूरे देश की नींद उड़ा दी थी. निर्देशक मेघना गुलजार और लेखक विशाल भारद्वाज ने मिलकर एक ऐसा सस्पेंस बुना है, जहां हर सुराग एक नई कहानी कहता है. यदि आप दिमागी कसरत वाली और रोंगटे खड़े कर देने वाली फिल्में पसंद करते हैं, तो यह स्पाई-क्राइम थ्रिलर आपके लिए अनिवार्य है.

सत्य की कई परतें और निष्पक्ष नजरिया- 'तलवार' की सबसे बड़ी ताकत इसका 'रशोमोन इफेक्ट' है, जहां एक ही अपराध को अलग-अलग चश्मों से दिखाया गया है. फिल्म यह फैसला दर्शकों पर छोड़ देती है कि वे किसे अपराधी मानें. यह दिखाती है कि कैसे एक ही सबूत को देखने का नजरिया पुलिस और सीबीआई के लिए बिल्कुल अलग हो सकता है. यह निष्पक्षता फिल्म को साधारण मर्डर मिस्ट्री से बहुत ऊपर ले जाती है.

इरफान खान: एक्टिंग की एक नई परिभाषा- सीबीआई अधिकारी अश्विन कुमार के किरदार में इरफान खान ने जो जान फूंकी है, उसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है. बिना किसी शोर-शराबे के, सिर्फ अपनी आंखों के इशारों और चेहरे की थकान से उन्होंने सिस्टम की लाचारी को पर्दे पर उतार दिया है. उनकी बेहतरीन 'डेडपैन' कॉमेडी और संजीदगी फिल्म के भारी माहौल में एक 'धुरंधर' संतुलन पैदा करती है.

सिस्टम के खोखलेपन पर तीखा हमला- यह फिल्म हमारी जांच एजेंसियों और पुलिसिया कार्यप्रणाली की धज्जियां उड़ाती है. फिल्म बहुत ही सफाई से दिखाती है कि कैसे शुरुआती जांच में की गई छोटी सी लापरवाही ने एक मासूम की जान के बदले न्याय को ही सूली पर चढ़ा दिया. मीडिया ट्रायल और बिना सबूत के चरित्र हनन जैसे मुद्दों को फिल्म बहुत ही बेबाकी से उठाती है, जो दर्शकों के भीतर गुस्सा पैदा करता है.

सस्पेंस से भरी कसी हुई बनावट- विशाल भारद्वाज की कलम ने इस फिल्म को एक ऐसी लय दी है कि आप पलक झपकना भी भूल जाएंगे. फिल्म का माहौल इतना तनावपूर्ण और डार्क (Dark) रखा गया है कि आप हर पल उस केस की घुटन महसूस करते हैं. अंधेरे कमरे, फाइलें और सरकारी दफ्तरों का शोर एक ऐसी मिस्ट्री खड़ी करता है, जिसे अंत तक सुलझाना नामुमकिन लगता है.

वो अंत जो कभी खत्म नहीं होता- फिल्म का क्लाइमैक्स कोई समाधान नहीं, बल्कि एक बड़ा सवाल है. अंतिम दृश्यों में दो जांच टीमों के बीच की बहस यह दिखाती है कि कैसे न्याय, व्यक्तिगत अहंकार की भेंट चढ़ जाता है. वह टेबल वाली चर्चा फिल्म का सबसे प्रभावशाली हिस्सा है, जो फिल्म खत्म होने के बाद भी आपके दिमाग में गूंजती रहती है. यह अंत आपको अंदर से सुन्न कर देने की ताकत रखता है.

First published on: Mar 11, 2026 10:05 PM

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