---विज्ञापन---
1 घंटे 56 मिनट की एकदम जबरदस्त और तगड़ी फिल्म, कहानी देख आ जाएगा मजा

सिनेमा जगत में अक्सर कहा जाता है कि हर चमकती चीज सोना नहीं होती, और विक्रांत मैसी की हालिया रिलीज 'ब्लैकआउट' (Blackout) इसका जीता-जागता उदाहरण है. '12th फेल' जैसी मास्टरपीस देने के बाद विक्रांत से दर्शकों को जो उम्मीदें थीं, इस फिल्म ने उन पर पानी फेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी. अगर आप अपना कीमती वक्त और पैसा बचाना चाहते हैं, तो यह रिव्यू आपके लिए 'चेतावनी' की तरह है.

अंडा पाव से शुरू होकर मर्डर तक का 'बचकाना' सफर- फिल्म की कहानी पुणे की एक अंधेरी रात की है, जहां शहर में बिजली गुल (ब्लैकआउट) है. एक रिपोर्टर लेनिन (विक्रांत मैसी) अपनी पत्नी के लिए अंडा पाव लेने निकलता है. रास्ते में उसकी गाड़ी चोरों की एक वैन से टकरा जाती है, जिसमें करोड़ों का सोना और कैश है. यहां से शुरू होता है हादसों का सिलसिला एक मर्डर होता है, जिसे एक शराबी (सुनील ग्रोवर) देख लेता है. कहानी सुनने में दिलचस्प लग सकती है, लेकिन परदे पर यह उतनी ही थकाऊ है.

उम्मीदों का 'ब्लैकआउट'- शुरुआत के 15-20 मिनट आपको लगता है कि शायद कोई मजेदार डार्क-कॉमेडी देखने को मिलेगी. कुछ ट्विस्ट आते हैं जो उम्मीद जगाते हैं, लेकिन जल्द ही फिल्म इतनी दिशाहीन हो जाती है कि आपको अंधेरे में बैठना ज्यादा बेहतर लगने लगता है. फिल्म का एक्शन और कॉमेडी दोनों ही इतने 'हल्के' हैं कि वे मनोरंजन के बजाय सिरदर्द देने लगते हैं.

एक्टिंग- विक्रांत मैसी '12th फेल' के बाद विक्रांत का कद बहुत ऊंचा हुआ है, लेकिन इस फिल्म में उन्हें देखना दुखद है. उन्होंने फिल्म का प्रमोशन भी ज्यादा नहीं किया, जिससे साफ झलकता है कि शायद वे खुद इस 'मजबूरी' वाले प्रोजेक्ट से खुश नहीं थे. सुनील ग्रोवर जब तक वे 'सस्ते गालिब' वाली शायरी सुनाने वाले शराबी के रोल में हैं, तब तक वे झेला जा सकता है. लेकिन जैसे ही उन्हें एक 'डॉन' के रूप में पेश किया गया, उनका किरदार पूरी तरह बिखर गया. मौनी रॉय ने यह फिल्म क्यों साइन की, यह एक ऐसा रहस्य है जिसे सुलझाना नामुमकिन है.

डायरेक्शन भी दमदार- निर्देशक देवांग भावसर ने इस फिल्म के जरिए यह सिखा दिया है कि कैसे बेहतरीन कलाकारों की फौज होने के बावजूद एक फिल्म को पूरी तरह बर्बाद किया जा सकता है. एक अच्छी शुरुआत को उन्होंने इतने खराब तरीके से अंजाम दिया कि क्लाइमैक्स तक आते-आते दर्शक खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं.

क्या आपको यह देखनी चाहिए?- यह फिल्म न तो टाइमपास है और न ही थ्रिलर. यह सिर्फ वक्त की बर्बादी है. अगर आप विक्रांत मैसी या सुनील ग्रोवर के फैन हैं, तो उनकी पुरानी अच्छी फिल्में देख लें, लेकिन 'ब्लैकआउट' के अंधेरे में न फंसें.