स्टेज पर बैठे थे... पूरा हॉल तालियों से गूंज रहा था... देश का सबसे बड़ा सम्मान मिलने वाला था... लेकिन तभी अचानक उनकी सांसें उखड़ने लगीं और जश्न का माहौल पलभर में चिंता और अफरा-तफरी में बदल गया। बात हो रही है हिंदी सिनेमा के शोमैन राज कपूर की, जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी फिल्मों के नाम कर दी, लेकिन जिंदगी के आखिरी दिनों में एक-एक सांस के लिए संघर्ष करना पड़ा। राज कपूर लंबे समय से अस्थमा से पीड़ित थे, फिर भी उन्होंने कभी बीमारी को अपने काम के बीच नहीं आने दिया। अपने ड्रीम प्रोजेक्ट 'हीना' की तैयारियों में भी वे लगातार व्यस्त रहे और आराम करने के बजाय काम को ही प्राथमिकता देते रहे। इसी बीच साल 1988 में नई दिल्ली में आयोजित समारोह में उन्हें भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया जाना था, लेकिन सम्मान ग्रहण करने से पहले ही उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई और उन्हें गंभीर अस्थमा अटैक आया। मौके पर मौजूद मेडिकल टीम ने तुरंत प्राथमिक उपचार दिया और उन्हें एम्स अस्पताल में भर्ती कराया गया। शुरुआती इलाज के बाद कुछ समय के लिए उनकी हालत में सुधार की उम्मीद जरूर जगी, जिससे परिवार और करीबी लोगों को लगा कि वह जल्द ठीक होकर घर लौट आएंगे, लेकिन कुछ ही दिनों बाद उन्हें निमोनिया सहित कई गंभीर जटिलताओं ने घेर लिया। डॉक्टरों ने उन्हें बचाने की हरसंभव कोशिश की, मगर उनकी हालत लगातार बिगड़ती चली गई। आखिरकार 2 जून 1988 को राज कपूर ने अंतिम सांस ली। उनके निधन के साथ भारतीय सिनेमा ने अपने सबसे महान अभिनेता, फिल्मकार और शोमैन में से एक को खो दिया, लेकिन उनकी फिल्में, संगीत और सिनेमाई विरासत आज भी करोड़ों लोगों के दिलों में उसी शिद्दत से जिंदा हैं।