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ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर कैसे तय होती है फिल्मों की कीमत? जानिए डील के पीछे का असली खेल!

Movies On Ott Platforms: आजकल सिर्फ सिनेमाघरों में ही नहीं, बल्कि ओटीटी पर भी फिल्में देखने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है. हालांकि फिल्मों को लेकर अब ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने अपनी रणनीति बदल दी है. पहले फिल्मों के लिए प्लेटफॉर्म्स के बीच होड़ चलती थी और खरीदने के लिए बोलियां लगती थीं, लेकिन कोरोना के बाद से धीरे-धीरे काफी कुछ बदल गया है.

OTT platforms how to decide price of films

Ott Platforms: फिल्मों की दुनिया में अब ओटीटी प्लेटफॉर्म्स का पुराना अंदाज बदल गया है. वह दौर बीत गया है, जब नेटफ्लिक्स और अमेजन प्राइम जैसे प्लेटफॉर्म्स बड़ी फिल्मों को खरीदने के लिए बिना सोचे-समझे करोड़ों की बोली लगाते थे. दरअसल कोरोना के समय बिडिंग वॉर चलती थी. यानी बड़ी-बड़ी फिल्मों को खरीदने के लिए ओटीटी प्लेटफॉर्म्स बोलियां लगाते थे, लेकिन अब वो दौर खत्म हो चुका है. इसकी जगह अब उसकी जगह 'बॉक्स ऑफिस रिटर्न्स' ने ले ली है. अब स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स ने फिल्मों की कीमत तय करने का एक नया और सतर्क तरीका अपना रहे हैं, जहां फिल्म की सफलता ही उसकी असली कीमत तय करती है.

ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के बीच थी होड़

फिल्म विशेषज्ञों के अनुसार, कोरोना महामारी के दौरान फिल्मों को लेकर ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के बीच एक अलग ही होड़ मची थी. उस समय सिनेमाघर बंद थे और दर्शक घरों में बैठे थे, जिसका फायदा उठाने के लिए प्लेटफॉर्म्स ने फिल्मों को उनकी वास्तविक कीमत से दो से तीन गुना ज्यादा कीमत पर खरीदा. उस समय इन प्लेटफॉर्म्स का मुख्य उद्देश्य सिर्फ सब्सक्राइबर्स बढ़ाना था. लेकिन इसके बाद समय बदला और प्लेटफॉर्म्स को समझ आया कि केवल बड़े स्टार्स के नाम पर भारी रकम खर्च करना घाटे का सौदा साबित हो रहा है.

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अब थिएटर का परफॉर्मेंस तय करेगा ओटीटी की कीमत

आजकल ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने करेक्शन का दौर शुरू किया है. फिल्म बिजनेस एनालिस्ट गिरीश जौहर का कहना है कि अब प्लेटफॉर्म्स फिल्मों की कीमत को सीधे उनके थिएटर में प्रदर्शन (Theatrical Performance) से जोड़ रहे हैं. ओटीटी प्लेटफॉर्म्स का अब ये तर्क यह है कि अगर कोई फिल्म सिनेमाघरों में ऑडियंस को नहीं खींच पा रही तो वह ऐप पर भी ज्यादा कमाल नहीं दिखाएगी. इसलिए अब प्लेटफॉर्म्स किसी भी तरह का रिस्क लेने के बजाय सोच-समझकर दांव लगा रहे हैं.

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नए पेमेंट मॉडल का गणित

पुराने मॉडल में मेकर्स अपनी फिल्म की लागत का करीब 60% से 80% हिस्सा ओटीटी राइट्स बेचकर ही वसूल कर लेते थे. हालांकि अब जो ये नया मॉडल है, वो 'बेस प्राइस' पर आधारित है. यानी अब प्लेटफॉर्म्स एक तय बेस प्राइस देते हैं और फिल्म के थिएटर में अच्छे प्रदर्शन के आधार पर 5-10% के स्लैब में अतिरिक्त भुगतान करते हैं. इसका मतलब है कि फिल्म जितनी ज्यादा हिट होगी, ओटीटी से उतनी ही ज्यादा कमाई होगी.

बड़े सौदों पर एक नजर

आईएमडीबी के अनुसार, कई बड़ी फिल्मों ने अब तक करोड़ों के सौदे किए हैं. इनमें सबसे ऊपर 'कल्कि 2898 AD' है, जिसके राइट्स लगभग ₹375 करोड़ में बिके. इसके बाद 'KGF: चैप्टर 2' (₹320 करोड़) और 'RRR' (₹300 करोड़) का नंबर आता है. हालिया रिलीज 'सिंघम अगेन' के राइट्स ₹130 करोड़ और फिल्म 'धुरंधर' के दोनों पार्ट्स के लिए करीब ₹130 करोड़ की डील हुई है.

सैटेलाइट राइट्स की चमक हुई फीकी

एक समय था, जब टीवी पर फिल्म दिखाने के अधिकार (सैटेलाइट राइट्स) मेकर्स की कमाई का बड़ा हिस्सा होते थे. लेकिन अब स्थिति यह है कि सैटेलाइट राइट्स फिल्म के बजट का मुश्किल से 10% ही कवर कर पाते हैं. सारा फोकस अब डिजिटल राइट्स और थिएटर कलेक्शन पर टिक गया है.


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