'रजाई बिना रतिया कैसे कटी…' ये गाना आपने जरूर सुना होगा. साल 1994 में रिलीज हुई फिल्म 'घर की इज्जत' का ये गाना आज भी लोगों की जुबान पर है. पहली बार सुनने पर इसकी धुन और बोल आपको बिल्कुल देसी भोजपुरी गाने जैसे लगेंगे, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस गाने का कनेक्शन बिहार या उत्तर प्रदेश से नहीं, बल्कि भारत से हजारों किलोमीटर दूर कैरेबियन देशों से है? दरअसल, यह गाना वहां के मशहूर चटनी म्यूजिक से इसंपायर्ड है. इस म्यूजित के पीछे भारतीय मजदूरों की एक दिलचस्प और दर्दभरी कहानी छिपी है.
अंग्रेजों ने भारतीय मजदूरों को पहुंचाया कैरेबियन
19वीं सदी में ब्रिटिश साम्राज्य ने अपनी कॉलोनियों में दास प्रथा खत्म की. इसके बाद गन्ने के खेतों में मजदूरों की कमी पड़ गई. इस कमी को पूरा करने के लिए बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश समेत भारत के कई हिस्सों से मजदूरों को एग्रीमेंट के तहत कैरेबियाई देशों में ले जाया गया.
गिरमिटिया मजदूरों से हुई शुरुआत
इन मजदूरों से कई साल तक खेतों में काम करने का करार कराया जाता था उस समय ज्यादातर मजदूर पढ़े-लिखे नहीं थे और अंग्रेजी में लिखे एग्रीमेंट को वे 'गिरमिट' कहते थे. इसी वजह से उन्हें गिरमिटिया मजदूर कहा जाने लगा.
बोली और गीत बने पहचान
इन मजदूरों को फिजी, मॉरीशस, गुयाना और खास तौर पर ट्रिनिदाद एंड टोबैगो जैसे देशों में ले जाया गया. घर परिवार से हजारों किलोमीटर दूर इन लोगों ने अपनी भाषा, लोकगीत और परंपराओं को ही अपनी पहचान बनाए रखा. कई मजदूर वहीं बस गए और भोजपुरी भाषा को भी अपने साथ कैरेबियन संस्कृति का हिस्सा बना दिया.
कैसे हुई चटनी म्यूजिक की शुरुआत?
शादी, त्योहार और दूसरे पारिवारिक मौकों पर गाए जाने वाले भारतीय लोकगीतों में जब स्थानीय कैरेबियाई संगीत और लय का मेल हुआ, तो धीरे-धीरे चटनी म्यूजिक की शुरुआत हुई.
सुंदर पोपो ने दिलाई पहचान
समय के साथ चटनी म्यूजिक ने अपना अलग अंदाज बना लिया. 1970 के दशक में सुंदर पोपो ने इस संगीत को पॉपुलर बनाने में बड़ी भूमिका निभाई. भोजपुरी और भारतीय लोकधुनों के साथ कैरेबियाई बीट का ये मेल लोगों को खूब पसंद आया.
कैसे दूसरे देश की पहचान बनी भारत का ये संगीत
बाद में इस संगीत की गूंज भारत तक भी पहुंची. भोजपुरी गायिका कल्पना पटवारी ने चटनी म्यूजिक को अपनी आवाज के जरिए भारतीय ऑडियंस तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई. बॉलीवुड ने भी इस अनोखे म्यूजिक स्टाइल को अपनाया और 'रजाई बिना रतिया' तथा 'फूलौरी बिना चटनी जैसे गाने दर्शकों के बीच पॉपुलर हुए.
कहानी जो छू ले दिल
यानी जिसे हम आज एक देसी भोजपुरी गाना समझकर सुनते हैं, उसके पीछे भारत से कैरेबियन तक पहुंची गिरमिटिया मजदूरों की विरासत और उनकी मिट्टी से जुड़ी यादों की कहानी छिपी है.