सुभाष के. झा
शूजित सरकार की फिल्म 'पिकू' ने आज से एक दशक पहले एक ऐसी कहानी सुनाई थी, जो हर परिवार में कहीं न कहीं दोहराई जाती है। एक बुजुर्ग पिता की जिद और एक बेटी की जिम्मेदारियों से भरी जिदगी। 10 साल पूरे होने पर निर्देशक शूजित सरकार ने फिल्म से जुड़ी यादें शेयर कीं हैं। उन्होंने बताया है कि कैसे 'पिकू' आज भी लोगों के दिलों में जिदा है और क्यों इस फिल्म को कोई नहीं भूल सकता।
फिल्म ‘पीकू’ पर क्या बोले शूजित सरकार
फिल्म 'पिकू' को रिलीज हुए 10 साल हो गए हैं लेकिन इस फिल्म का जिस्ट अभी भी लोगों के अंदर जिंदा है। एक ओवर-पजेसिव पिता और जिम्मेदार बेटी की यह कहानी आज के जनरेशन का परफेक्ट उदाहरण है। शूजित सरकार कहते हैं, “मैंने कभी नहीं सोचा था कि ‘पीकू’ आज भी लोगों को इतनी अपनी जैसी लगेगी। यूथ लड़कियां और लड़के आज भी आकर बताते हैं कि उनकी जिदगी में भी कोई भास्कर या पीकू जैसा है। बंगाली परिवारों में आज भी सुबह की बातचीत में पेट, होम्योपैथी और पॉलिटिक्स शामिल होती है।”
फिल्म में दिल्ली से कोलकाता तक की रोड ट्रिप सिर्फ एक जर्नी ही नहीं थी, बल्कि रिश्तों के बदलती फीलिंग की कहानी थी। शूजित सरकार ने इस जर्नी को इतना सहज और वास्तविक रखा कि दर्शक खुद को इस सफर का हिस्सा मानने लगे।
बच्चन, दीपिका और इरफान—एक परफेक्ट टीम
जब शूजित से पूछा गया कि अगर आज वे ‘पिकू’ बनाते तो राणा का किरदार कौन निभाता? उन्होंने भावुक होकर कहा, “बहुत मुश्किल सवाल है। इरफान की जगह कोई नहीं ले सकता। उनका जाना हमारी इंडस्ट्री की सबसे बड़ी क्षति है। वे ‘सरदार उधम’ के लिए भी मेरी पहली पसंद थे।”
शूजित ने खुलासा किया कि अमिताभ बच्चन को भास्कर के किरदार में लेना तय था क्योंकि वे कोलकाता और बंगाल के व्यवहार से परिचित हैं। इरफान को स्क्रिप्ट से पहले ही फाइनल कर लिया गया था। वे अक्सर पूछते, “दादा, लव स्टोरी है ना?” और शूजित मुस्कुराकर कहते, “कुछ तो है।” दीपिका को उन्होंने कहा, “दीपिका ही पीकू हैं। कोई और उनकी जगह नहीं ले सकता। उनके और पूरी टीम के बीच जादुई तालमेल था।”
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पीकू क्यों बनी यादगार फिल्म?
‘पीकू’ के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा कि इस फिल्म में कोई बड़ा ट्विस्ट नहीं था। कोई मेलोड्रामा नहीं था, बस जिंदगी की असलियत थी। खाने की टेबल की बातें, ट्रैफिक में अटकी गाड़ी, और पेट साफ होने पर चर्चा जैसे मामूली सीन्स भी फिल्म को खास बनाते हैं। सिंगर अनुपम रॉय का घरेलू सा म्यूजिक इस एहसास को और गहरा करता है। फिल्म के एंडिग को लेकर उन्होंने कहा, “लोग पूछते हैं कि पीकू और राणा का क्या हुआ। मैं कहता हूं, मुझे भी नहीं पता। कुछ रिश्ते समझाए नहीं जा सकते।” वे मानते हैं कि भास्कर ने अपनी बेटी को जिदगी के लिए तैयार कर दिया था, यही फिल्म का असली मकसद था। इस फिल्म ने साबित किया कि दर्शकों को रिश्तों की ईमानदारी चाहिए, भले ही कहानी में कोई बड़ा ड्रामा न हो। ‘पीकू’ एक ऐसी फिल्म है जिसे दर्शक अपने घर ले जाना चाहते हैं, बार-बार देखना चाहते हैं और हर बार उसमें खुद को ढूंढ लेते हैं।
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