Bharat Bhhagya Viddhaata Review: 26/11 मुंबई आतंकी हमले पर बनी फिल्मों की सूची लंबी है, लेकिन भारत भाग्य विधाता भीड़ से अलग खड़ी दिखाई देती है. वजह सिर्फ इसकी कहानी नहीं, बल्कि उसका नजरिया भी है. यह फिल्म गोलियों और आतंक के बीच उन लोगों की कहानी कहती है, जिनके हाथों में हथियार नहीं, बल्कि स्टेथोस्कोप था.
मनोज तापड़िया का निर्देशन
निर्देशक मनोज तापड़िया ने इस बार कैमरा उन डॉक्टरों और नर्सों की ओर मोड़ा है, जिन्होंने मुंबई के कामा अस्पताल में मौत के साये के बीच अपने फर्ज को सबसे ऊपर रखा. आतंकियों के हमले के दौरान अस्पताल में फंसे मरीजों को सुरक्षित निकालना और हालात को संभालना किसी युद्ध से कम नहीं था. फिल्म इसी अनकही बहादुरी को पर्दे पर उतारने की कोशिश करती है.
कंगना रनौत का किरदार कैसा?
कंगना रनौत अपने किरदार में संयमित और प्रभावी दिखाई देती हैं. लंबे समय बाद उनका अभिनय किरदार की जरूरत के मुताबिक नजर आता है, जहां संवादों से ज्यादा आंखें कहानी कहती हैं. स्मिता तांबे और गिरिजा ओक समेत अन्य कलाकार भी फिल्म को मजबूती देते हैं.
कहानी का मजबूत पक्ष
फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष उसका माहौल है. निर्देशक दर्शकों को उस भयावह रात के बीच ले जाने में सफल रहते हैं, जहां हर आवाज खतरे का संकेत बन जाती है. कई दृश्य बेचैन करते हैं और यह एहसास दिलाते हैं कि बहादुरी की परिभाषा सिर्फ युद्धभूमि तक सीमित नहीं होती.
फिल्म यहां दिखी कमजोर
हालांकि फिल्म पूरी तरह से प्रभाव छोड़ने में कुछ जगह चूकती भी है. स्क्रीनप्ले कई बार धीमा पड़ जाता है और कुछ हिस्से जरूरत से ज्यादा लंबे महसूस होते हैं. अगर संपादन थोड़ा और चुस्त होता, तो फिल्म का असर कहीं अधिक गहरा हो सकता था.
अनसुने नायकों को समर्पित फिल्म
फिर भी भारत भाग्य विधाता की सबसे बड़ी जीत उसकी ईमानदारी है. यह फिल्म राष्ट्रवाद को नारों और शोर में नहीं, बल्कि कर्तव्य, करुणा और मानवीय साहस में तलाशती है. यही बात इसे बाकी फिल्मों से अलग बनाती है.
भारत भाग्य विधाता शायद 26/11 पर बनी सबसे बेहतरीन फिल्म न हो, लेकिन यह उस त्रासदी के एक ऐसे अध्याय को सामने लाती है, जिसे लंबे समय तक नजरअंदाज किया गया. अनसुने नायकों को समर्पित यह फिल्म देखी जानी चाहिए.