Shekhar Suman Emotional on Late Son's Last Words: बॉलीवुड से टीवी तक अपनी एक्टिंग का जलवा बिखेरने वाले एक्टर शेखर सुमन एक बार फिर सुर्खियों में हैं. हाल ही में शेखर सुमन ने दिल्ली में हो रहे विरोध प्रदर्शन का समर्थन किया और इसे राजनीति का हिस्सा बताया. इसके अलावा, उन्होंने कई अन्य मुद्दों पर भी बात की. इस दौरान शेखर अपनी जिंदगी के सबसे मुश्किल दौर को याद कर भावुक हो गए। यह वह समय था, जब उनके बड़े बेटे आयुष को एक गंभीर बीमारी हो गई थी, जिसके चलते उनका निधन हो गया था. आइए जानते हैं कि शेखर सुमन ने इस दर्दनाक घटना के बारे में क्या बताया.
मैं पूरी तरह से टूट गया था…
द लल्लनटॉप को दिए एक इंटरव्यू में शेखर सुमन ने अपने बड़े बेटे आयुष को याद करते हुए कहा, 'मुझे पता चला कि मेरे बेटे को एक लाइलाज बीमारी हो गई है. सबसे पहले तो उस समय मेरे पास कोई काम नहीं था. ऊपर से हमें इतनी दुखद खबर मिली. इससे मैं पूरी तरह से टूट गया था. मुझे लगा कि मेरे जीवन में कुछ भी नहीं बचा है. मैं इतना कमा भी नहीं रहा था कि उसकी देखभाल कर सकूं. मैं घर से भी पैसे नहीं लेना चाहता था। वह बहुत मुश्किल समय था.'
मेरा फोन बजता तो…
शेखर ने आगे कहा, 'उस वक्त मैं टीवी में काम नहीं करना चाहता था. जब भी मेरा फोन बजता और मैं यह सोचकर उठाता कि शायद किसी फिल्म का ऑफर होगा, तो ज्यादातर सीरियल के ऑफर ही निकलते थे. एक दिन मुझे डायरेक्टर आनंद महेंद्रू का फोन आया. उन्होंने बताया कि वह 'देख भाई देख' नाम का एक सीरियल बना रहे हैं. जब मैंने उनसे कहा कि मुझे सीरियल में काम करने में कोई दिलचस्पी नहीं है, तो उन्होंने मुझसे इस बारे में दोबारा सोचने के लिए कहा. उन्होंने बताया कि जया बच्चन इसकी प्रोड्यूसर हैं और कई बड़े नाम इस प्रोजेक्ट से जुड़े हैं. मैंने इस प्रोजेक्ट के लिए हामी भर दी और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.'
पापा, मैं जाना नहीं चाहता…
शेखर ने आगे बताया कि उनके बेटे आयुष की तबीयत दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही थी. उन्होंने कहा, 'अपनी मौत से पहले उसने संस्कृत के श्लोक पढ़ने शुरू कर दिए थे. वह 11 साल का था. मुझे नहीं पता कि उसने यह कैसे किया. उसने कहा कि उसने एक सुनहरी रोशनी आते हुए देखी. उसने मेरा हाथ पकड़ा और मुझसे कहा, 'पापा, मैं जाना नहीं चाहता. प्लीज मुझे बचा लीजिए.' फिर उसने संस्कृत के कुछ श्लोक पढ़ने शुरू कर दिए और हम सब हैरान रह गए. उस समय उसके साथ मौजूद सभी लोगों से, यहां तक कि हमारे ड्राइवर से भी, उसने कहा कि वह उन सबसे प्यार करता है. वह एक फरिश्ते जैसा था। वह बहुत प्यारा बच्चा था.'
आज भी नहीं भरा बेटे को खोने का घाव…
शेखर ने आगे कहा, 'मुझे अब भी नहीं पता कि हमारे साथ यह त्रासदी कैसे हुई. लेकिन शायद यही नियति थी. माता-पिता के लिए अपने बच्चों को खोने से बड़ी कोई त्रासदी नहीं हो सकती. आज भी हम हर दिन दो-तीन घंटे सिर्फ उसके बारे में सोचने और बात करने में बिताते हैं. यह एक ऐसा घाव है, जो कभी नहीं भरेगा.'