मोहम्मद रफी की आवाज आज भी संगीत प्रेमियों के दिलों में खास जगह रखती है. उन्होंने अपने करियर में हजारों गीत गाए, लेकिन कुछ गानों की किस्मत भी उनकी तरह ही अनोखी रही. ऐसा ही एक गीत था, जिसे रिलीज होने के लिए पूरे 9 साल का इंतजार करना पड़ा. हैरानी की बात यह है कि इस गाने को एक-दो नहीं बल्कि तीन फिल्मों से रिजेक्ट कर दिया गया था. बाद में यही गीत हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार रोमांटिक गानों में शामिल हो गया.
कौनसा है वो गाना?
यह कहानी है रफी साहब, संगीतकार मदन मोहन और गीतकार कैफी आजमी की शानदार रचना 'तुम जो मिल गए हो, तो ये लगता है' की… इस अमर गीत को सबसे पहले साल 1964 में फिल्म 'हकीकत' के लिए तैयार किया गया था, लेकिन किसी वजह से इसे फिल्म में जगह नहीं मिल सकी.
'आखिरी खत'
इसके बाद 1966 में निर्देशक चेतन आनंद अपनी फिल्म 'आखिरी खत' बना रहे थे. उस समय मदन मोहन विदेश में थे और फिल्म की शूटिंग तेजी से पूरी करनी थी. समय की कमी के कारण यह गीत फिर इस्तेमाल नहीं हो पाया और एक बार फिर फाइलों में बंद होकर रह गया.
'हीर रांझा'
किस्मत ने तीसरी बार भी इस गीत का साथ नहीं दिया. साल 1970 में चेतन आनंद की फिल्म 'हीर रांझा' बन रही थी. मेकर्स ने इस गाने पर विचार किया, लेकिन फिल्म की देहाती और पारंपरिक कहानी के बीच इस वेस्टर्न अंदाज के गीत को फिट नहीं माना गया. नतीजा यह हुआ कि एक और मौका हाथ से निकल गया.
'हंसते जख्म'
लगातार तीन फिल्मों से रिजेक्ट होने के बाद भी मदन मोहन ने इस गीत को संभालकर रखा. आखिरकार साल 1973 में आई फिल्म 'हंसते जख्म' में इसे जगह मिली. नवीन निश्छल पर फिल्माया गया यह गीत जब सिनेमाघरों में गूंजा तो दर्शक इसकी धुन और रफी साहब की जादुई आवाज में खो गए.
रिलीज के बाद पाया प्यार
'तुम जो मिल गए हो, तो ये लगता है' रिलीज होते ही सुपरहिट साबित हुआ. इसकी मधुर धुन, गहरे बोल और रफी साहब की भावुक गायकी ने इसे हिंदी सिनेमा के सबसे बेहतरीन रोमांटिक गीतों में शामिल कर दिया. आज भी बारिश का मौसम हो या लंबा सफर, यह गीत लोगों की प्लेलिस्ट का अहम हिस्सा बना रहता है.
आज भी है फेवरेट
यह कहानी साबित करती है कि किसी रचना की असली पहचान उसे मिलने वाले मौके से होती है. कभी तीन-तीन फिल्मों से ठुकराया गया यह गीत आज भी संगीत प्रेमियों की आंखें नम कर देता है और रफी साहब व मदन मोहन की जोड़ी की महानता का सबसे खूबसूरत उदाहरण माना जाता है.