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Raksha Bandhan Review: परफेक्ट फैमिली फिल्म है ‘अक्षय कुमार’ की रक्षाबंधन, अहसास की लौटता हिंदी सिनेमा

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जब रक्षाबंधन का ट्रेलर आया, तो झटका सा लगा कि ऐसा कैसे हो सकता है? आनंद एल रॉय जैसा डायरेक्टर, अक्षय कुमार जैसा एक्टर एक ऐसी फिल्म लेकर कैसे आ सकते हैं, जिसे हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ने बरसों पर पहले पीछे छोड़ दिया हो ? और अब तो रक्षा-बंधन पर बजने वाले गाने भी सदियों पुराने वाले हो गए हैं। ऐसे में जब आनंद एल रॉय और अक्षय कुमार ने रिर्टन्स टू फीलिंग्स का नारा दिया, तो दिल में खुशी तो हुई, लेकिन एक डर भी था कि क्या ऑडियंस इसे ऐसे ही एक्सेप्ट करेगी ?

 

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चार बहन और एक भाई, मां को किया वादा, इस वादे के चलते तलवार की धार पर चल रही उसकी अपनी प्रेम कहानी ये सब ट्रेलर में दिखा। लेकिन रक्षा बंधन की कहानी इससे बहुत आगे की है।

चांदनी चौक पर पीढ़ियों से गोलगप्पे खिलाकर, गर्भवती महिलाओं को बेटे का प्रसाद देने का दावा करने वाले लाला केदारनाथ, जो बार-बार कहता है कि बेटा और बेटी देना तो राम जी के हाथों में हैं, लेकिन दुकान उसकी इसी दावे के साथ चलती है। पुरखों का लिया हुआ लोन चुकाने के चक्कर में लाला, अपनी बहनों के ब्याह के लिए दहेज नहीं जोड़ पा रहा है। और बहने भी देवी जैसी, सबमें अलग-अलग रूप-अलग-अलग रंग, अलग-अलग गुण। दिन-रात केदारनाथ चाट बेच कर, बहनों के दहेज जोड़ने में जुटा रहता है। और बहनें, अपने भाई के साथ मस्ती करती रहती हैं। बहनों की ज़िम्मेदारियों के बीच लाला की लव-स्टोरी पूरी होने में पहाड़ जैसी अड़चन है। लाला के प्यार सपना की शादी करवाने के लिए उसके डैडी का भरोसा टूट रहा है। गुप्ता जी किसी भी क़ीमत पर अपनी बेटी सपना की शादी रिटायरमेंट के पहले करवा देना चाहते हैं।

रात को जगराता करने और चाट बेचने के बाद भी दहेज की रकम पूरी नहीं हो रही । लेकिन कैसे भी करके लाला अपनी पहली बहन गायत्री की शादी निपटाता है। फिर कहानी में ऐसा ट्विस्ट आता है कि केदार और उसकी बहनों की दुनिया तूफ़ान ला देता हो। अपने बहनों की शादी के लिए किडनी तक बेच देने वाले भाई का रिश्ता, ख़ून का ना होकर भी इतना गाढ़ा है कि दहेज के लिए सताई गई अपनी बहन की मौत की ख़बर पाने के बाद, सड़कों पर दौड़ते हुए उसके कमर से बहता ख़ून, उसके आंसू और दर्द के सामने छोटा हो जाता है।

कमाल की बात है ना कि लोग कहते हैं कि फिल्में सच्चाई नहीं दिखाती। देखिए, रक्षाबंधन सच्चाई दिखा रही है, प्रॉब्लम बता रही है और उसका समाधान भी सुझा रही है कि अपनी बहन और बेटी को पढ़ा-लिखाकर इतना काबिल बनाओ कि उनका साथ पाने के लिए लंबी-लंबी लाइनें लगें। बहन और बेटियां अपनी पसंद का साथी चुने।

दो घंटे से भी छोटी रक्षाबंधन, आपको रिश्ते में बांध लेती हैं। हिमांशु और कनिका की कहानी, रक्षाबंधन की जान हैं। इसके गाने, इसका बैकग्राउंड स्कोर आपको वो एहसास कराता है, जो बरसों में सिनेमा से अछूता रहा है। रिश्तों के ये गोलगप्पे तीखे हैं, खट्टे है, मीठे हैं, नमकीन है सब कुछ बिल्कुल परफेक्ट है।

डायरेक्टर आनंद एल रॉय ने इस बार हिंदुस्तान की उस नब्ज़ को छुआ है, कि आप इस फिल्म को देखेंगे, हसेंगे, रोएंगे और मुस्कुराएंगे। थियेटर से बाहर निकलेंगे, तो अपने अंदर कुछ बदलता हुआ पाएंगे।

परफॉरमेंस पर आइए, तो अक्षय कुमार ने लाला केदारनाथ के किरदार के लिए खुद को ज़रा सा भी नहीं बदला है। सफेद होती दाढ़ी, और काली मुछों के साथ अपनी उम्र का उन्होने ज़रा सा भी नहीं छिपाया है। बस वो लाला केदारनाथ बन गए हैं। अक्षय की ये सबसे सच्ची परफॉरमेंस हैं। चारो बहनों के किरदार में गायत्री बनी सादिया ख़तीब पर सबसे ज़्यादा फोकस रहा, और सादिया ने बिल्कुल निराश नहीं किया है। वो चमकी है सितारा बनकर। सहेजमीन, स्मृति और दीपिका का काम भी शानदार है। सीमा पहवा तो पूछिए नहीं, मैरिज ब्यूरो की मालिक बनी सीमा पहवा का रूआब शानदार है। अक्षय के साथी बने साहिल मेहता की कॉमिक टाइमिंग कमाल की है। सपना के पापा बने नीरज सूद से आप नाराज़ भी होंगे, लेकिन फिल्म ख़त्म होते-होते उनसे प्यार करने लगेंगे। सबसे ख़ास मेंशन देना है भूमि पेडनेकर को, बतौर सपना अपने किरदार को भूमि ने जैसे निभाया है उसके लिए उनके लिए स्टैडिंग ओवेशन बनता है। आनंद एल ऱॉय ने भूमि से किया वादा निभाया और भूमि ने भी इस सपने को पूरा किया है।

 

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रक्षा बंधन देखिए, क्योंकि ये फिल्म ज़रूरी है, इसके अहसास, इसकी नीयत सब कुछ बहुत साफ़ है। ये आपको सिखाती है रिश्ते निभाना और साथ में देती है एक ऐसी सीख, जो हमारे-आपके, सबके लिए ज़रूरी है।

रक्षा बंधन को 4 स्टार।

 

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