Monday, December 5, 2022
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Samrat Prithviraj Movie Review: अक्षय की ये फिल्म बॉक्स ऑफिस की Winner है, इतिहास पर होगी बड़ी बहस

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सम्राट पृथ्वीराज का ट्रेलर जब से रिलीज हुआ, तो सोशल मीडिया पर एक अजीब से हलचल देखने को मिलने लगी। अक्षय के फैन्स भी नाराज़ होते दिखें, वो पृथ्वीराज बने अक्षय में हाउसफुल के बाला का किरदार देखने लगे। फिल्म प्रमोशन के दौरान अक्षय ने एक न्यूज एजेंसी को इंटरव्यू दिया, तो बोल दिया कि देश में लोगों को सही इतिहास नहीं बताया गया, उन्हे सम्राट पृथ्वीराज चौहान के बारे में नहीं बताया गया… उसके बाद तो और बवाल शुरु हो गया। कोई अक्षय को इतिहास पढ़ाने लगा, तो कोई फिल्म के बायकॉट का बहाना तलाशने लगा। राजनीतिक सरगर्मियों के बीच सम्राट पृथ्वीराज थियेटर्स में आ गई है, तो क्या अक्षय बाला लगे हैं, क्या पृथ्वीराज की कहानी इतिहास पर खरी उतरी है और सबसे बड़ी बात कि ये फिल्म कैसी है ? ये रिव्यू आपके हर सवाल का जवाब देगा।


ज़ाहिर है हम सबने, कम से कम 8वीं तक स्कूल गए बच्चे ने भी पृथ्वीराज चौहान की कहानी सुनी है। अजमेर के राजा से दिल्ली के सम्राट के बने, मोहम्मद गौरी को हराने के बाद, उससे दूसरे युद्ध में हारने वाले कन्नौज के राजा जयचंद की बेटी संयोगिता से उसके पिता की इच्छा के विरुद्ध विवाह करने वाले सम्राट पृथ्वीराज चौहान के बारे में पढ़ा है। पृथ्वीराज के दोस्त, उनके कवि और ज्योतिषी मित्र – चंद बरदाई के काव्य रचना पृथ्वीराज रासो की कुछ कविताएं भी याद कराई गई हैं।

खास तौर पर – चार बांस चौबीस गज अंगुल अष्ट प्रमाण ता ऊपर सुल्तान है मत चूके चौहान !

यहां से दोबारा याद दिलाना ज़रूरी है कि अपने 14 साल की रिसर्च के बाद सम्राट पृथ्वीराज बनाने वाले डायरेक्टर डॉक्टर चंद प्रकाश द्विवेदी ने ये फिल्म इतिहासकारों के हिसाब नहीं, चंद बरदाई की काव्य रचना – पृथ्वीराज रासो के हिसाब से बनाई है। तो ज़ाहिर है ये वो इतिहास नहीं है, जिसे आपने किताबों में पढ़ा है, उसमें कुछ बदलाव है। अब ये बहस का मुद्दा हो सकता है कि सही कौन और गलत कौन? लेकिन एक फिल्म के लिहाज़ से इसकी कहानी पृथ्वीराज रासो के इर्द गिर्द घूमती है। फिल्म में दिखाया गया है कि मुहम्मद गौरी ने अपने भाई की बग़ावत, जो गौरी के दरबार में एक नाचने वाली से प्यार करके, उसके साथ भागकर – सम्राट पृथ्वीराज की शरण में पहुंचता है, उसे पकड़ने के लिए पृथ्वीराज से पहली बार युद्ध किया और हारा। पृथ्वीराज ने उसे गौरी को हराने के बाद भी उसे छोड़ दिया।


दूसरी बार राजा जयचंद, जो अपनी बेटी संयोगिता के पृथ्वीराज से ब्याह करने के खिलाफ़ था, उसने मुहम्मद गौरी को पृथ्वीराज से युद्ध करने के लिए दिल्ली बुलाया, ताकि गौरी, पृथ्वीराज को ज़िंदा पकड़कर उसे जयचंद के हवाले कर दे। मगर मुहम्मद गौरी ने युद्धक्षेत्र में जंग जीतने की बजाय, सोते हुए पृथ्वीराज के सैनिकों पर हमला किया। अपने सामंतों की जान बचाने के लिए पृथ्वीराज ने गौरी के सामने हथियार डाले, और फिर वो क्लाइमेक्स, जहां गौरी ने पृथ्वीराज की दोनो आंखें निकाल लीं। उन्हे शेरों से लड़वाया, आख़िर में सम्राट पृथ्वीराज की चुनौती पर गौरी खुद मैदान में उतरा। पृथ्वीराज ने एक ही तीर से घोड़े पर बैठे गौरी पर सटीक निशाना लगाया।


यानि वो चार बांस चौबीस गज वाली कविता भी डॉक्टर चंद्र प्रकाश द्विवेदी की कहानी का हिस्सा नहीं है। हां ये ज़रूर है कि चंद बरदाई की कविता के सहारे, पृथ्वीराज ने अपने लक्ष्य साधे, ये ज़रूर दिखाया गया है। डॉक्टर द्विवेदी की कहानी एतिहासिक रूप से कितनी सही है, ये फैसला इतिहासकारों पर छोड़ते हैं। हम ये देखते हैं कि फिल्म कैसी है… तो सम्राट पृथ्वीराज एक शानदार फिल्म है। बेहतरीन लिखे हुए डायलॉग्स जो आपको थियेटर में बार-बार तालियां बजाने पर मजबूर कर देंगे। गौरी के साथ आख़िरी लड़ाई से शुरु हुई ये फिल्म, अपने फ्लैश बैक में राजकुमारी संयोगिता और पृथ्वीराज के रिश्ते के इर्द-गिर्द बुनी गई है। राजकुमारी संयोगिता को दिल्ली की रानी बनाने के बाद, पृथ्वीराज के महिलाओं को बराबरी का हक़ देने वाले हर सीन इतना बेहतरीन है कि आप ये फिल्म अपनी फैमिली को ज़रूर दिखाना चाहेंगे।


स्टोरी, स्क्रीनप्ले, डायलॉग्स और डायरेक्शन के हर डिपॉर्टमेंट परे में डॉक्टर चंद्र प्रकाश द्विवेदी के परफेक्शन की दाद देंगे। ये फिल्म जोधा-अकबर, बाजीराव-मस्तानी और पद्मावत से एक कदम आगे निकलती है। मानुष नंदन की सिनेमैटोग्राफी, संचित का बैकग्राउड स्कोर पृथ्वीराज की ताकत है। इसके सेट, कॉस्ट्यूम, फाइट सेक्वेंस, कास्टिंग सब कुछ शानदार है। 14 साल की रिसर्च, 2 साल का वीएफएक्स का काम, 250 करोड़ का बजट, और लंबा इतज़ार सब कुछ जायज़ लगता है।


परफॉरमेंस पर आइए, तो पृथ्वीराज चौहान के किरदार में अक्षय कुमार शानदार है, अक्षय ने इस किरदार में सब कुछ दिया है। ट्रेलर से मूंछो वाले कुछ सीन्स को लेकर उन्हे ट्रोल करने वाले फिल्म देखने के बाद मानेंगे कि एक्टर तो वो शानदार हैं। मानुषी छिल्लर, सम्राट पृथ्वीराज का वो नगीना हैं, जो खूबसूरत भी है और बेशक़ीमती भी। मानुषी ने रानी संयोगिता के किरदार में जान-फूंक दी है, एक बार भी अहसास नहीं होने दिया है कि वो पहली बार एक्टिंग कर रही हैं। चांद बर्दय के किरदार में सोनू सूद, इतना फबे हैं कि उनके लिए अलग से तालियां बजनी चाहिए। काका कान्हा बने संजय दत्त से बेहतर इस किरदार को कोई और नहीं निभा सकता था, जब वो रस्सी से बांधकर हाथी के पैर खींचते हैं, तो आपको यकीन होता है कि – ये हो सकता है। आशुतोष राणा और साक्षी तंवर मंझे हुए कलाकार हैं और हर किरदार को अपना बना लेते हैं।


फिल्म के तौर पर सम्राट पृथ्वीराज में दम है कि वो थियेटर्स में वापस लोगों को ला सकती है, इतिहास के नज़र से तो बहस की शुरुआत अब होगी।

सम्राट पृथ्वीराज को 4 स्टार।

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