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Jayeshbhai Jordaar Review: ‘भाई तू एक दम ज़ोरदार’, रनवीर सिंह की ये फिल्म देखिए और दिखाइए

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आपने KGF2 देखी है, आपने RRR देखी है… हीरोगिरी के लिए तालियां बजाई हैं, सिक्के उछाले हैं। लेकिन असल हीरोगिरी वो नहीं है, असल हीरोगिरी है – जयेशभाई जोरदार।

जयेशभाई जोरदार के ट्रेलर में जो नहीं दिखा, गानों में जो नहीं दिखा… वो आपको फिल्म में दिखेगा। समझ आएगा कि बड़े-बड़े डायरेक्टर, बड़े-बड़े सेट्स और बड़े-बड़े स्टार्स के साथ काम करने वाले रनवीर सिंह ने आखिर नए डायरेक्टर पर भरोसा क्यों कर लिया। साथ ही ये भी समझ आएगा कि नए बड़े-बड़े विलेन्स से टक्कर लेने से कहीं ज़्यादा मुश्किल है अपनों से टकराना… पीढियों से चली आ रही गलत रवायत के खिलाफ़ आवाज़ उठाना।

यकीन जानिए थियेटर में मैं इस उम्मीद के साथ पहुंचा था कि रनवीर सिंह को देखुंगा, उनकी परफॉरमेंस और डांस को देखुंगा… लेकिन रनवीर ने तो पूरी फिल्म में कहीं मुझे नज़र ही नहीं आएं। नज़र आया, तो बस – जयेशभाई, जो 100 फीसदी जोरदार है।

पहली नज़र में जयेशभाई जोरदार कहानी लगती है एक जयेशभाई पटेल की, जो अपनी बीवी मुद्रा के पेट में सांस ले रही बच्ची को बचाना चाहता है, अपने पिता रामलाल पटेल से, अपनी मां अनुराधा पटेल से और उस रिवायत से, जहां बेटा ही वंश को आगे बढ़ाता है। इसके लिए जयेश भाई अपने घर से अपनी पत्नी और बेटी को लेकर भागता है, घर वालों का सामना करता है, अपने आपको नपुंसक बनाने की धमकी भी देता है…. मगर अपनी बेटी को किसी भी हाल में बचाना चाहता है।

दिलचस्प बात ये है कि फिल्म के गुजराती बैकग्राउंड के होने की बावजूद, इसे गुजरात के किसी शहर का नाम नहीं दिया गया, एक फिक्शनल गांव के नाम से फिल्म का बैकड्रॉप सेट किया गया। लेकिन लड़कियो के ना होने के चलते, पूरी की पूरी कंवारे लड़कों वाली पीढ़ी के गांव को लाडोपुर को बाकयदा हरियाणा में दिखाया गया है। सच तो यही है कि कोई भी राज्य अपने उपर बच्चों के सेक्स डिर्टमिनेशन और लड़कियों को गर्भ में गिरा दिए जाने का इल्ज़ाम नहीं चाहता, चाहे खुले आम, धड़ल्ले से बेटियों को मां की कोख़ में ही ख़त्म किया जा रहा हो। इस गलत को मानने और रोकने के लिए मर्द बनने की ज़रूरत होगी, लेकिन मर्द बनने के मायने समाज में अलग-अलग हैं।

बेटी पढ़ाओ और बेटी बचाओ से आगे, जयेश भाई की कहानी, असली मर्द की मर्दानगी को दिखाती है, जो अपनी बीवी से बेइंतहा प्यार करता है। अपनी बेटी को अपना वंश मानता है। खुश्बू वाले साबुन से नहाने वाली लड़कियों की खुश्बू को सुंघकर बहक जाने वाले लड़कों की सोच की पड़ताल करता है। और बिना कुछ कहे, मायूस रोने वाली औरतों के बीच, रोता है।
ये कहानी बिना कुछ कहे, बहुत कुछ कह जाती है। थियेटर के अंदर आपको कुर्सी पर बैठे-बैठ अनकर्फटेबल कर देगी, शायद आपको ये फिल्म एंटरटेनमेंट के लिहाज़ से पसंद ना आए। लेकिन अगर जयेशभाई को देखकर, उसकी हौसले को देखकर, उसके प्यार को देखकर आपकी ज़ुबां से तारीफ़ नहीं निकलती, तो एक बार खुद की पड़ताल करने की ज़रूरत है।
दिव्यांग ठक्कर की लिखी कहानी और उनके डायरेक्शन के लिए ज़ोरदार तालियां बननी चाहिए, क्योंकि सिनेमा का काम आपको एंटरटेन करना ही नहीं है। थियेटर के बंद अंधेरे कमरे से आपको ज़रा सा बदलकर भेजना भी है और दिव्यांग ने जयेशभाई ज़ोरदार से, ये काम क्या खूब किया है। यशराज फिल्म्स को भी इसके लिए तारीफ़े मिलनी चाहिएं कि उन्होने ऐसी फिल्म का हाथ पकड़ा और रनवीर सिंह जैसे स्टार को इस फिल्म के लिए राज़ी किया।


परफॉरमेंस पर आइए, तो जयेशभाई के किरदार में रनवीर सिंह ने खुद को खो दिया है। कोई हीरोगिरी नहीं, कोई लाउड डायलॉग बाज़ी नहीं, बिल्कुल सच्चा किरदार… जो दिल से निभाया गया है और सीधे दिल तक पहुंचता है। शालिनी ने मुद्रा के किरदार को जिस मासूमियत से जिया है, वो काबिल-ए-तारीफ़ है, क्या कहने। मगर तालियां बजती रहनी चाहिए, जयेशभाई और मुद्रा की बेटी निशा का किरदार निभाने वाली चाइल्ड ऑर्टिस्ट जिया वैद्य के लिए। इस फिल्म में रनवीर के साथ, जिया भी हीरो हैं।
बोमान ईरानी और रत्ना पाठक तो इतने मंझे हुए कलाकार हैं कि वो अपने हर कैरेक्टर में कुछ नया देकर जाते हैं।
परदे पर हीरोगिरी देखकर पैसे उड़ाने वाली जेनेरेशन और ट्विटर पर बॉलीवुड बायकॉट करने का पैग़ाम देने वाले ट्रोलर्स को पकड़-पकड़कर जयेश भाई जोरदार दिखानी चाहिए, ताकि उन्हे असली मर्दानगी का अहसास हो सके।
जाइए थियेटर देखिए और दिखाइए – जयेशभाई ज़ोरदार, जिसे हम दे रहे हैं परफेक्ट 4 स्टार।

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