Wednesday, September 28, 2022
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Dobaaraa Review: तापसी अनुराग की ये फिल्म बुझो तो जाने वाला खेल खेलती है, जिसे दर्शक खेलने के मूड में ही नहीं हैं

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‘दोबारा’, यानि 2:12, यानि फिर से दोबारा। स्पैनिश फिल्म ‘मिराज’ को दोबारा हिंदी में बना कर, सजाकर अनुराग कश्यप ने पेश किया है। जिन्हें, उन्होने ये फिल्म रिलीज़ के पहले दिखाई है, वो सदके दिए जा रहे हैं कि क्या पिक्चर बनाई है। ये फिल्म इंडस्ट्री का वो जाल है, जिसमें अक्सर समीक्षक फंस जाते हैं। और फिर बतौर डायरेक्टर अनुराग कश्यप और बतौर अभिनेत्री तापसी पन्नू का आभामंडल ऐसा है कि आपको लगता है कि आप कुछ कमाल का देखने जा रहे हैं। फिर अगर फिल्म में आपको कुछ ख़ास कमाल का ना लगे, या फिर यूं कहें कि समझ ना आए, तो लगता है यही तो फिल्म की यूएसपी है।

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ज़मीन का सिनेमा, किरदारों का कमाल अनुराग कश्यप की ख़ासियत रही है। अपने ही अंदाज़ के सिनेमा पर अनुराग के लिए खूब तालियां भी बजी हैं। लेकिन ये इस बात की गारंटी नहीं हो जाती, कि उनकी हर फिल्म कमाल की ही होगी। तापसी पन्नू के लिए भी आप यही बात कह सकते हैं, क्योंकि तापसी अपनी फिल्मों, अपने किरदारों के लिए और अपनी हटके वाली च्वाइस के लेए जानी जाती हैं। आप ये कहेंगे कि ‘दोबारा’ की बात छोड़कर हम इन दोनो की बात क्यों कर रहे हैं। दरअसल, ये फिल्म आप सब इन्ही दोनो की क्रेडिबिलिटी पर देखने वाले हैं। मगर अच्छे मसाले से बना खाना हर बार अच्छा हो, ये ज़रूरी तो नहीं। यही बात ‘दोबारा’ के साथ लागू होती है।

बिल्कुल स्पैनिश फिल्म मिराज की तरह ‘दोबारा’, दो टाइम जोन की कहानी है। एक कहानी शुरु होती है 1996 से और दूसरी 2021 से। इन 25 साल के बीच का कनेक्शन है एक पुराना कैमरा और पुराना टीवी सेट। 1996 में एक बच्चा, जो कैमरे पर अपने पापा के वीडियो देख रहा है और उनके लिए अपना मैसेज रिकॉर्ड कर रहा है, वो पास वाले घर में एक मर्डर होते देखता है और फिर एक फायर ट्रक के साथ एक्सीडेंट में मारा जाता है। उस घर को 25 साल बाद एक फैमिली खरीदती है, और उस कमरे में, उसी कैमरे और टीवी के साथ अंतरा, उस बच्चे के साथ बात कर पाती है, जो 25 साल पहले मरा था। अंतरा, अनय को बचाती है और अगली सुबह सब कुछ बदला जाता है। पूरी टाइम लाइन बदल जाती है। अंतरा, जो पहली टाइम लाइन में एक नर्स थी, अब एक डॉक्टर है। उसका पति, उसकी बेटी सब कुछ एक बदल जाता है। अब ये कहानी अनय की तलाश, खूनी को साबित करने, अंतरा का अपनी बेटी अवंती को वापस पाने की दीवानगी के साथ, एक बार फिर उस कैमरे, उस टीवी से होकर गुज़रता है।

इस सारे सेक्वेंस को जस्टीफाई करने के लिए अनुराग कश्यप ने एक मैग्नेटिक स्टॉर्म, यानि एक ऐसे तूफ़ान का रिफरेंस प्वाइंट लिया है, जो जब आता है तो बहुत कुछ बदल जाता है और जिसे साइंस भी नहीं समझ पाता। मुश्किल यही है कि जिसे साइंस भी नहीं समझ पता, उसे टीवी न्यूज़ चैनल की बीच-बीच में कमेंट्री दिखाकर, आसमान से नीचे गिरती हुई बिजली, बरसते हुए पानी को दिखाकर ऑडियंस को समझाने की कोशिश की है, अनुराग कश्यप ने। अगर आपको ये नहीं समझ आया, तो यही तो अनुराग कश्यप का सिनेमा है। लेकिन सच तो ये है कि इस समझने के लिए फिल्म को दोबारा देखने के लिए, किसी को तैयार करवा पाना मुमकिन नही है।

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मिराज का मतलब होता है, जो दिख रहा है वो है नहीं। ‘दोबारा’ का मतलब हो, सब कुछ दोबारा। मिराज को दोबारा बनाकर अनुराग ने जैसे चैलेंज दिया है कि समझकर बताओ, लेकिन दरअसल इस पहेली को सुलझाने में क्रिस्टोफर नोलान की फिल्म जैसा मज़ा नहीं आने वाला। सवा दो घंटे की इस फिल्म में स्क्रीनप्ले सबसे कमज़ोर कड़ी है। बतौर डायरेक्टर अनुराग ने अपने इस रीमेक से निराश किया है।

तापसी पन्नू, जिनसे कुछ जुदा करने की उम्मीदें हमेशा होती है, उन्होने ‘दोबारा’ में ऐसा कुछ नहीं किया है, जो हमने पहले नहीं देखा हो। सारस्वता चटर्जी का कैरेक्टर बहुत स्केची सा है, जैसे आप कॉमिक बुक के विलेन को देख रहे हों। पावली गुलाटी को अपने किरदार पर और काम करने की ज़रूरत है। हां राहुल भट्ट ने दोबारा में अपनी टाइमिंग से इप्रेस ज़रूर किया है।

‘दोबारा’, एक अच्छी स्पैपिश फिल्म मिराज की रीमेक है, जो नेटफ्लिक्स पर स्ट्रीम हो रही है। थियेटर में जाकर दोबारा इस पहेली को सॉल्व करने का कोई ख़ास मतलब नहीं है।

दोबारा को 2 स्टार।

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