Mai Review

सबसे पहले डिस्क्लेमर की अगर आप एंटरटेनिंग स्टोरी तलाश रहे हैं तो नेटफ्लिक्स की सीरीज़ ‘माई’ आपके लिए नही है। लेकिन अगर आप कुछ बेहतरीन देखने की तलाश में हैं, जो दिमाग़ को झकझोर दे और देखने के बाद ज़ेहन के अंदर ही अंदर घूमता रहे, तो फिर ‘माई’ एक परफेक्ट च्वाइस है।

ट्रेलर आने के साथ ही माई को, श्रीदेवी की मॉम से कंपेयर किया जाना शुरु हो गया। वैसे फिल्म का बेसिक प्लॉट है भी वही, कि अपनी बेटी के क़ातिलों से बदला एक मां उन सबको ख़त्म करके लेती है। मगर ‘माई’ की पूरी कहानी, सिचुएशन्स, किरदार, साजिश सब कुछ अलग है।

 

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6 एपिसोड वाले पहले सीजन की कहानी माई, एक ओल्ड एज होम में काम करने वाली शील चौधरी की कहानी है। शील की ज़िंदगी लोगों का ख़्याल रखने में, पति की नाकामी से जूझने की, बच्चों की ख़्वाहिशों में पूरा करने में निकलती है। लेकिन पहले ही एपिसोड में उनकी बेटी सुप्रिया की मौत एक हादसे में हो जाती है, जिसमें एक ट्रक ड्राइवर शील की

आंख़ों के सामने ही सुप्रिया को उड़ा देता है। वो पकड़ा भी जाता है। उसे सजा भी होती है, लेकिन जब कोर्ट उसे सजा देती है, तो वो मां शील के सामने कह बैठता है कि वो ये करना नहीं चाहता था। यही से शील की तलाश शुरु हो जाती है अपनी बेटी सुप्रिया की मौत की वजह और उसके कातिलों का पता लगाने की।

एक मां, अपनी बेटी के क़ातिलों से बदला लेने के लिए किस मुकाम तक जा सकती है, ये देखकर आप थर्रा उठेंगे। हांलाकि ट्रेलर में इसकी एक छोटी सी झलक दिखाई गई है। लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती जाती है, राज़ खुलते जाते हैं। लखनऊ में हुए मेडिकल स्कैम और फिर इसके गैंग, हज़ारों करोड़ हथियाने की साज़िश, गैंग पर कंट्रोल रखने के ऐसे-ऐसे पहलू सामने आते हैं कि शील उसमें उलझती चली जाती है।

पहले वो जवाहर तक पहुंचती है, जो एक बड़ा बिजनेसमैन और पॉलिटिशयन है। जवाहर को अपनी बेटी का कातिल समझते हुए शील हालात में ऐसी उलझती है कि उसे जवाहर के लिए काम करने वाले प्रशान्त और शंकर का साथ लेना होता है। इसके बाद वो जवाहर की मिस्ट्रेस नीलम तक पहुंचती है। इस बीच शील को सुप्रिया के उस प्यार के बारे में पता चलता है, जिसे उसने सबसे छिपा रखा था। स्पेशल पुलिस फोर्स के ऑफिसर फारुख सिद्दीकी के साथ सुप्रिया के रिश्तों की कश्मकश….. दूसरी ओर अपने पति के बड़े भाई और उनकी पत्नी के साथ रिश्तों की अजब सी उधेड़बुन से होते हुए। माई हर एपिसोड में उलझती जाती है। और क्लाइमेक्स तक पहुंचकर ऐसा झटका देती है, जहां से माई के सीज़न टू का सिरा खुल जाता है।

डेब्यूटेंट डायरेक्टर अतुल मोगिंया और फिल्लौरी के डायेरक्टर अन्शई लाल ने माई को डायरेक्ट किया है और क्या खूब डायरेक्ट किया है। एक भी लम्हे को इस कहानी को बिखरने नहीं दिया है। बिना किसी मिर्च-मसाले को उन्होने शुरु से आख़िर तक माई को इटेंस रखा है। तमल सेन, अमृता व्यास के साथ अतुल मोंगिया ने माई की कहानी भी लिखी है। और ये कहानी, इसकी सिचुएशन, हादसे और होते क़त्ल…सब कुछ सिचुएशनल है, फोर्स्ड नहीं। बस एक सीन से थोड़ा ज़्यादा बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया गया है, जहां एसपीएम के हाईड आउट में नीलम को ख़त्म करने के लिए, उस गोलियों और बारूदों से हमला किया जाता है। इससे बचा जा सकता था।

परफॉरमेंस पर आएं, तो लिखकर लीजिए कि साक्षी तंवर, स्मॉल स्क्रीन की सबसे कमाल एक्ट्रेस हैं। शील चौधरी के किरदार में साक्षी की आंख़ें और चेहरे का एक-एक भाव जैसे बोलता है। सुप्रिया के किरदार में वामिका गब्बी ने बिना बोले ही सब कुछ बोल दिया है। इससे पहले ग्रहण में वामिका ने ऐसा ही करिश्मा किया था। वाकई कमाल। शील के पति हर्ष के किरदार में विवेक मुशरान बिल्कुल कैरेक्टर में हैं। एसपीएफ़ ऑफिसर फारुख़ बने अंकुर रतन का किरदार बहुत सोच-समझकर लिखा गया है, और उसे अंकुर ने निभाया भी बहुत खूबी से है। नीलम के किरदार में राइमा सेन, बेहतरीन है। जवाहर और मोहनदास के डबल किरदार में प्रशान्त अपने किरदार में खूबी से उतरे हैं। प्रशान्त बने अनंत विधात आपको हर सीन में कन्विन्स करते हैं, और शंकर के किरदार में वैभव राज गुप्ता को आपको गुल्लक के अन्नू भैया से जुदा बिल्कुल नई पहचान में दिखते हैं। सीमा पहवा, ने इस सीरीज़ माई का सबसे डार्क कैरेक्टर निभाया है। और यकीन मानिए माई में सीमा पहवा के कुछ सीन्स गुंगबाई काठियावाड़ी के उनकी परफॉरमेंस पर भारी पड़ते हैं।

माई एक बेहतरीन वेब सीरीज़ है, डार्क है, इंटेंस है। इसे देखना तो बनता है।

माई को साढ़े तीन स्टार।

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