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Babli Bouncer Review: लेडी बाउंसर बनकर ‘तमन्ना भाटिया’ उम्मीद जगाती हैं, मधुर भंडारकर की हटके फिल्म

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डिज़्नी हॉटस्टार पर ‘बबली बाउंसर’ स्ट्रीम हो रही है। अब इस फिल्म के साथ मधुर भंडारकर जैसे स्टार का नाम जुड़ा है, एक और वुमेन सेंट्रिक फिल्म है। मधुर की इमेज के मुताबिक जाइएगा, तो ‘बबली बाउंसर’ को देखकर हैरान हो जाइएगा, क्योंकि इसमें कॉमेडी भी है, ज़िंदगी भी है और हर ज़िंदगी के पीछे राज़ हों, ऐसा भी नहीं है। तो मधुर की फिल्मों को देखकर, लोगों की ज़िंदगी के पीछे झांकने की जो आदत लगी है, वो ‘बबली बाउंसर’ में नहीं है।


चांदनी बार से लेकर इंदू सरकार तक, मधुर भंडारकर का एक अलग सिनेमा होता आया है। वैसे इस बार खुद उन्होने अपनी लकीर तोड़ी है। एक ख़ास ज़िंदगी में झांकने में की बजाए, नेशनल अवॉर्ड विनर डायरेक्टर ने भारत के छोटे-छोटे शहरों की आम लड़कियों की ज़िंदगी में झांका है। जहां, चुल्हे-चौके, संस्कारी शिक्षा और शादी-बच्चों में पिसती ज़िंदगी के बीच, एक लड़की के कुछ करने वाली उम्मीद की कहानी है – ‘बबली बाउंसर’।

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ये कहानी दिल्ली-एनसीआर से लगे हरियाणा के फतेहपुर असोला गांव से शुरु होती है, जो बाउंसर विलेज के नाम से मशहूर है। देश की राजधानी दिल्ली और आस-पास जहां कहीं भी बाउंसर्स की ज़रूरत होती है, ज़्यादातर बाउंसर यही से जाते हैं। इसी गांव की एक लड़की, जो पहलवानों के घर की बेटी है, खुद में दबंग है। नाम उसका बबली है, लेकिन गांव के मनचलों की हालत उसे देखते ही पतली हो जाती है। बबली दसवीं फेल है, जमकर खाती है, कसरत करती है और डकार लेने में शर्मिंदगी महसूस नहीं करती। कहानी में ट्विस्ट तब आता है, जब उसे अपनी स्कूल टीचर के फॉरेन रिटर्न बेटे के प्यार में पड़ जाती है और उसे इंप्रेस करने के लिए दिल्ली के एक पब में लेडी बाउंसर की जॉब करती है।

फीमेल बाउंसर, सुनने में कितना भी अजीब लगे, मगर बबली की ये नौकरी उसे एक नई पहचान देती है।
अब ये कहानी आपको सीधी भले ही लगे, हो सकता है कि आपको ये भी लगे कि इसमें मधुर भंडाकर की फिल्म जैसा क्या है। तो इसका जवाब हां भी है और नहीं भी। क्योंकि ये फिल्म बाउंसर्स की ज़िंदगी से आपको रूबरू कराती है, समझाती है कि सेलिब्रिटीज़ के इर्द-गिर्द, क्लब के बाहर और अंदर खड़े बाउंसर्स की असली पहचान क्या होती है।

‘बबली बाउंसर’ की खूबी ये है, कि छोटे शहरों के आम परिवरों की तरह, ना बबली को ज़िंदगी में कुछ खास करने की चाहत है, ना उसके परिवार को उससे शादी और बच्चों से आगे बढ़कर कुछ उम्मीदें हैं। बाप बेटी को प्यार तो करता है, उसकी बातें भी मानता है, लेकिन उसे कुछ होने-बनने के लिए तैयार करने की ज़हमत नहीं उठाता। लेकिन जब ज़िंदगी बबली को मौका देती है, तो प्यार के झूठ के लिए ही सही, वो बाउंसर बनना कुबूल करती है। और एक बार जब वो काम में जुटती है, तो पीछे नहीं हटती।

‘बबली बाउंसर’ कुछ सिखाती नहीं है, बस भरोसा दिलाती है कि हर बेटी ख़ास है। ये आम ज़िंदगी में भी कुछ ख़ास होने की उम्मीद जगाती है। फिल्म छोटी है। 1 घंटे, 57 मिनट की बबली बाउंसर बीच-बीच में हंसाती है, झटके भी देती है और आखिर में इंस्पायर करती है। अच्छी कहानी, एक अच्छा स्क्रीन प्ले और साथ में क्लब में बजते मधुर भंडारकर के ही फैशन फिल्म के गाने आपको बताते हैं कि ये किफायती फिल्म है।

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ये फिल्म पूरी तरह से तमन्ना भाटिया की फिल्म है। साउथ की फिल्मों की सुपरस्टार, मिल्की ब्यूटी कहलाने वाली तमन्ना भाटिया के हरियाणवी एक्सेंट को सुनकर आप हैरान हो जाएंगे। विराज जब बबली को बताता है कि वो उसके काबिल नहीं है, तो तमन्ना भाटिया के एक्सप्रेशन्स, देखकर आपको समझ आ जाएगा कि वो ख़ूब एक्ट्रेस हैं। बबली के बाबा के रोल में सौरभ शुक्ला शानदार लगे हैं। कुकु बने साहिल बहुत इंप्रेसिव हैं। विराज के किरदार में अभिषेक बजाज अच्छे हैं।

मधुर की फिल्मों की लीग में ‘बबली बाउंसर’ हटके हैं, फैमिली एंटरटेनर है। डिजनी हॉटस्टार पर स्ट्रीम हो रही है, और वीकेंड पर बिज वॉच के लिए अच्छा ऑप्शन है।

‘बबली बाउंसर’ को 3 स्टार।

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