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Sardar Udham Movie Review: 'इरफ़ान ख़ान' को विक्की कौशल का आख़िरी सलाम है 'सरदार उधम', पढ़े रिव्यू

E24

फिल्म - सरदार उधम सिंह

कलाकार - विक्की कौशल

डायरेक्टर - शूजित सरकार

स्टार -  4.5

अश्वनी कुमार, मुंबई। 2 घंटे 41 मिनट की फिल्म है, कोई एंटरटेनमेंट नहीं, कोई डांस नहीं, कोई गाना नहीं, सांस लेने तक की जगह नहीं, ये फिल्म पचेगी नहीं। क्योंकि ये कोई फिल्म नहीं, दस्तावेज है। भारत की आजादी के संघर्ष का सबसे खूनी दस्तावेज। इसे पढ़ना सबके बस की बात नहीं। फिर भी ये लिखकर लीजिए कि आज तक आजादी के मतवालों पर जितनी भी फिल्में बनी है, ‘सरदार उधम’ उनमें से सबसे सच्ची है। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में ऐसी फिल्म आज तक नहीं बनी।

अच्छा हुआ कि सरदार उधम को ओटीटी पर रिलीज कर दिया गया। क्योंकि बंद थियेटर में तो आप ये फिल्म नहीं दे सकते। एक बार में तो कतई नहीं। और ये दावा है कि ओटीटी पर भी आप सरदार उधम को एक बार में ख़त्म नहीं कर सकते, क्योंकि ये कहानी इतना बेचैन कर देती है कि आप असहज हो जाएंगे।

कहानी वही है, जो आप जानते हैं। या, जो आप नहीं जानते। क्योंकि सबको पता है कि सरदार उधम सिंह 13 अप्रैल 1919 को जलियावाला बाग में बेरहमी से क़त्ल हुए हिंदुस्तानियों का बदला लेने के लिए लंदन जाकर जनरल Michael O'Dwyer को गोली मारी और उसके बाद उन्हे फांसी की सजा दी गई। मगर इसके बीच में क्या ? ये कहानी उसके बीच की है, जो कम से कम हमारे टेक्स्ट बुक का हिस्सा नहीं रही। 

अंग्रेज़ी हुकूमत के इस खूनी खेल ने कैसे अमृतसर में लोगों की ज़िंदगियां बदल दी, पीढ़ियों तक ना ख़त्म होने वाला दर्द दे दिया ? कैसे भगत सिंह और सरदार उधम सिंह के बचपन को छीन लिया और जवानी भारत की आज़ादी के नाम कर दी ? ये सब इस फिल्म का हिस्सा है। सरदार उधम की कहानी बस इतनी सी नहीं है। जनरल Michael O'Dwyer को गोली मारने के बाद कैसे पूरी की पूरी ब्रिटेन गर्वनमेंट ये साबित करने में जुट जाती है कि उधम सिंह एक आतंकवादी है ना कि एक रिवोल्यूशनरी, ये देखकर लगता है कि 100 साल के बाद आज भी कुछ नहीं बदला है। लंदन की कोर्ट में सरदार उधम सिंह अपना नाम ‘राम मनोहर सिंह आज़ाद’ बताते हैं। हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई से मिलकर बने हिंदुस्तान की ताकत दिखाने के लिए। 23 साल की उम्र में भगत सिंह की समझ देखकर लगता है कि आज के भारत से पूछो कि ‘कोई ज़िंदा है’ ?

क्लाइमेक्स के 30 मिनट के दौरान, जब जलियावाला बाग़ के अंदर अंग्रेज़ी हुकूमत के तानाशाही की गोलियां चलनी शुरु होती हैं, उसके बाद से फिल्म देखना मुश्किल होने लगता है, लेकिन आप बेबसी से इसे देखते रहते हैं। बार-बार फिल्म को रोकते हैं, खुद को संभालते हैं और फिर देखने लगते हैं। 

सरदार उधम इतनी धीमे चलती है कि लगता है कि ये ख़त्म क्यों नहीं होती ? और अच्छा है कि ये इतना धीमे चलती है कि हम सबको अहसास हो कि वाकई जिस आज़ादी को आज हम 15 अगस्त और 26 जनवरी को फेसबुक और ट्विटर पर तिरंगे के साथ तस्वीरें लगाकर भूल जाते हैं, उसकी क़ीमत हमें समझ आए।

इस फिल्म को सोच से लेकर रिलीज़ होने तक पूरे 20 साल लगे हैं। तकरीबन उतना ही वक्त जितना जलियावाला बाग़ में निहत्थों पर गोलियां चलने और इसके कुसूरवार जनरल Michael O'Dwyer को सरदार उधम सिंह के हाथों गोली लगने में लगा। फिल्म की कहानी और स्क्रीनप्ले इतनी नायाब है कि आपको ये 1919 से 1940 तक के हर मंज़र के अंदर लेकर जाती है। रितेश शाह और शभेंद्रु भट्टाचार्या की स्क्रीप्ले को इसके लिए पूरे नंबर। 

शूजीत सरकार ने ये जानते हुए भी कि ये फिल्म मास को बिल्कुल अपील नहीं करेगी, बावजूद इसके उन्होने इसमें देश भक्ति के भारी-भरकम डायलॉग और हीरोबाज़ी से बचाकर रखा है। आपको समझ आता है कि वो स्टोरी टेलिंग के मास्टर हैं। 

परफॉरमेंस पर आएं, तो सरदार उधम परफेक्ट कास्टिंग का एक बेजोड़ नमूना है। उधम सिहं के रोल में विक्की कौशल ने जान फूंक दी है। बिना भारी भरकम डायलॉग के अपनी संजीदगी, आंख़ों और बॉडी लैग्वेंज से विक्की ने जैसे वक्त को पलट दिया है। 2021 में किसी एक्टर की ये सबसे बेहतरीन परफॉरमेंस है। भगत सिंह के किरदार में अमोल पराशर ने स्टीरियोटाइप तोड़कर रख दिया है, छोटे से रोल में अहसास दिलाया कि भगत सिंह ‘मेरा रंग दे बसंती चोला’ गाने वाले, सिक्स पैक वाले हीरो नहीं थे। बल्कि 23 साल की मासूम उम्र और फौलादी ईरादों वाले ऐसे नौजवान थे, जिन्हे वाकई आज़ादी का मतलब था। बिनिता संधू ने एक बार फिर बिना बोले, एक छोटी सी अपीयरेंस में इतना कुछ बोल दिया कि आप भी खामोश हो जाएंगे। हर किरदार, शानदार।

और अब बात फिल्म के आखिरी रिज़ल्ट की। तो समझिए कि ये फिल्म आप देख नहीं पाएंगे, लेकिन देखना ज़रूरी है।

सरदार उधम को 4.5 स्टार।

first published:Oct. 16, 2021, 10:33 a.m.

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