Review - फॉरगॉटेन आर्मी, कहानी 50 हज़ार हिंदुस्तानी सिपाहियों की जिन्हें मिली सिर्फ गुमनामी !

By Neetu Jan. 24, 2020, 8:47 p.m. 1k

अश्विनी कुमार - एमेज़ॉन प्राइम की वेब सीरीज़ – फॉरगॉटेन आर्मी की इन दिनों काफी चर्चा है। .ये कहानी है – आज़ाद हिंद फौज के 50 हज़ार हिंदुस्तानी सिपाहियों की। इस आर्मी के 26 हज़ार सिपाही अंग्रेज़ी हुकूमत से जंग लड़ते हुए शहीद हो जाते हैं लेकिन उन्हे मिलती है तो सिर्फ़ गुमनामी। कबीर ख़ान ने इसीलिए इस वेबसीरीज़ को – फॉरगॉटेन आर्मी दिया है। कबीर ख़ान ने 5 एपिसोड्स की इस कहानी को सिर्फ़ बनाया भर नहीं है, बल्कि आईना दिखाया है कि जिस आज़ादी को आज हम अपना हक़ समझते हैं... वो लाखों जवानों की कुर्बानियों का नतीजा है, जिनका इतना तो हक़ बनता है कि उनकी कहानी कही जाए, सुनी जाए और उन्हे एक करारा- सैल्यूट दिया जाए।

20 साल पुराने कबीर ख़ान के इस सपने को मुकम्मल होने में पूरे 3 साल लगे हैं। सिंगापूर से बर्मा तक आज़ादी के पहले के हिंदुस्तान को दिखाने में कबीर ख़ान ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। वैसे फॉरगॉटेन आर्मी के पहले एपिसोड की शुरूआत के साथ ही अहसास हो जाता है कि हम कुछ अलग देखने जा रहे हैं। शाहरुख़ का नरेशन - इन पांचो एपिसोड्स की शुरुआत को और भी ज़्यादा शानदार बना देता है।

1942 की सर्द रात में लाल किले में आज़ाद हिंद फौज के सिपाहियों को - गद्दार कहकर - कैद करने वाली अग्रेज़ी हुकूमत से शुरू होने वाली ये कहानी - 1995 में डेथ बेड पर सिंगापुर में अपनी बहन को आख़िरी वक्त में देखने पहुंचे - कैप्टन सोडी की है। इस कहानी में दो टाइम लाइन को एक साथ मर्ज किया गया है, जो बात बहुतों को खटक सकती है। अजीब ये भी लग सकता है कि कैप्टन सोडी 50 साल बाद फिर से उन्हीं जगहों पर कैसे जाते हैं! कहा ये भी जा सकता है कि ये कुछ ज़्यादा सिनेमैटिक लिबर्टी नहीं है। लेकिन सच ये है कि अगर इस कहानी को दो टाइम लाइन्स में ना सुनाया जाता, तो अहसास ना होता कि अग्रेज़ों की फौज से बगावत करके - सुभाष चंद्र बोस की एक आवाज़ पर - बनी - आईनए यानि इंडियन नेशनल आर्मी - जिसे हम आज़ाद हिंद फौज कहते हैं, उसके शहीदों को फॉरगाटेन आर्मी क्यों कहा गया?

बचे हुए सैनिकों के साथ सुलूक कैसा हुआ, अपने ही मुल्क में वो अचानक रिफ्यूजी कैसे हो गए और अपनी ही सेना के लिए वो गद्दार कैसे हो गए ? इस सीरीज़ की कहानी रिव्यू में मत सुनिए, इस रिपब्लिक डे पर इसे देखिए,  महसूस कीजिए कि आज़ादी का मतबल क्या होता है। क्योंकि ये कहानी बार-बार सुनाई जानी चाहिए, वक्त की धूल में इसे ख़ोना नहीं चाहिए। परफॉरमेंस की बात करें - तो सनी कौशल - कैप्टन सोडी के किरदार में उनते ही परफेक्ट हैं, जितने - ऊरी में उनके भाई - विक्की कौशल। सनी के एक्सप्रेशन्स, डायलॉग्स, बॉडी लैग्वेंज - इतने ज़बरदस्त हैं कि आप रश्क होने लगेगा कि इन भाईयों को एक्टिंग का हुनर - इतनी खूबी के साथ कैसे मिला है!

उम्र दराज़ कैप्टन सोडी का किरदार - एम के रैना ने निभाया है और वो शानदार है। आज़ाद हिंद फौज़ की फर्स्ट फीमेल बटालियन - लक्ष्मी बाई रेजीमेंट की माया के किरदार में - शरवरी वाग़ - खूबसूरत भी लगी हैं और जुझारू भी। शरवरी के लिए इससे शानदार डेब्यू नहीं हो सकता था। कैप्टन अरशद के रोल में रोहित चौधरी इस इंटेस सीरीज़ में - राहत की एक सांस हैं। असीम मिश्रा का कैमरावर्क इस सीरीज़ की हीरो है.. । कबीर ख़ान ने आज़ाद हिंद फौज़ की ओरिजिनल फुटेज भी इस सीरीज़ में खूब इस्तेमाल की है, जो इसे अथेंटिक बनाता है। एक्शन और कम्बॉट सीन्स शानदार हैं। 20 साल की रिसर्च फॉरगॉटेन आर्मी की जान है। कबीर ख़ान की इस वेब सीरीज़ को देखिए, इसे देखकर एंटरटेनमेंट भले ही कम हो, लेकिन अपने जवानों पर ग़ुमान होगा। और सबसे बड़ी बात - फॉरगॉटेन आर्मी को भूलिए नहीं... क्योंकि हमारी आज़ादी की क़ीमत - उनकी शहादत है।

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