कोरोना काल में पाई-पाई को मोहताज हुआ 'माउंटेन मैन दशरथ मांझी' का परिवार

By Neetu July 23, 2020, 12:19 a.m. 1k

अदिति त्यागी -  भारत के 'माउंटेन मैन (Mountain Man)के नाम से मशहूर दशरथ मांझी (Dashrath Manjhi) ने पूरी मानवता के लिए मिसाल कायम की। उन्होंने अपनी पत्नी के लिए खातिर पहाड़ को काट रास्ता बना डाला था। उनकी जिंदगी पर फिल्म द माउंटेन मैन फिल्म भी बनी थी  । कुछ अस्पताल और सड़कें उसके नाम पर हैं।लेकिन अब उनका परिवार भूख के खिलाफ लड़ाई लड़ रहा है।

आपको बता दें कि उनका परिवार फिलहाल कर्ज (Financial Crisis) में डूबा हुआ है। हालात ऐसे हैं कि मांझी के परिवार को मदद के लिए दूसरों के आगे हाथ फैलाना पड़ रहा है। देश में लॉकडाउन (Lockdown) लगने के बाद कोई काम भी नहीं मिल रहा था।हालांकि मांझी के परिवार को पहले सरकार से मदद मिली है, लेकिन वे भारी गरीबी का सामना कर रहे हैं, खासकर लॉकडाउन के दौरान, जिसने परिवार को बनाए रखने के कुछ साधनों के साथ लाखों लोगों को नौकरियों से बाहर धकेल दिया है। माउंटेन मैन के बेटे भगीरथ मांझी को वृद्धा पेंशन और बेटी को विधवा पेंशन का लाभ मिलता था जो वह भी बंद कर दिया गया है। 

दरअसल दशरथ मांझी के नाती मद्रास में काम करते थे और देश में लॉकडाउन (Lockdown) लगने के बाद वो अपने घर चले आये थे।लेकिन अब कोई काम भी नहीं मिल रहा था। और इसी बीच 10 दिन पहले दशरथ मांझी की दो वर्षीय नतिनी पिंकी कुमारी का एक्सीडेंट हो गया और उनका एक हाथ और पैर टूट गया है जिसके इलाज में 45 हजार खर्च हुए। इलाज के लिए परिवार वालों ने गांवों के लोगों से मदद ली है वहीं अभी भी नातिन पिंकी कुमारी के इलाज के लिए रूपये नहीं है और परिवार के लोग पैसे-पैसे के लिए दुसरो पर निर्भर हो गए हैं।  

इस मामले में बिहार के मशहूर नेता पप्पू यादव दशरथ मांझी के परिवार की मदद के लिए सामने आएं हैं और जितने भी इलाज में खर्च हो रहे हैं वह उठाएंगे। पप्पू यादव ने वादा किया है कि अभी हम बाढ़ के प्रकोप में फंसे लोगों को राहत पहुंचाने का काम कर रहे हैं इधर से काम पूरा होते ही हम सीधे जो भी दिक्कतें हो रही है उसका समाधान करेंगे।  

मांझी का निधन 2007 में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में कैंसर के कारण हुआ था। दशरथ मांझी की पत्नी फगुनी देवी का निधन पहाड़ी से गिरकर हो गया था। गांव के लिए उन्होंने पहाड़ काटकर रास्ता बनाया था।   1960 से 1982  तक वो हथौड़ी और छेनी से पहाड़ काटकर रास्ता बनाने में कामयाब  हुए। इस काम में उन्हें 22 साल लग थे। 55 किमी के रास्ते को उन्होंने 15 किमी कर दिया था। 

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